वे तो सौदागर हैं, ख़रीद-फ़रोख़्त ही ख़ुदा है उनका

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उनकी बातों में न आना, वे बनाना जानते हैं बेशक,
उनके हाथों में न आना, वे फँसाना जानते हैं बेशक।
वे तो सौदागर हैं, ख़रीद-फ़रोख़्त ही ख़ुदा है उनका,
उनके घातों में न आना, वे कमाना जानते हैं बेशक।
मज़हब की आड़ में कुकर्मों की झोली लिये फिरते हैं,
उनके ढकोसले में न आना, वे भरमाना जानते हैं बेशक।
अब आँखें खोलो, बहुत इस्तेमाल हुए हो उनकी ख़ातिर,
मुख़ालफ़त करने पर भी, वे हमें मनाना जानते हैं बेशक।
इश्क़-महब्बत-प्रेम-प्यार, उनके लिए सब खिलौने होते,
उनसे दूर-दूर रहना, वे दीवाना बनाना जानते हैं बेशक।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जून, २०२० ईसवी)