देश की लगभग क्रीम आबादी वाले सभी शहरों की दुर्दशा पिछले 7 सालों में बद से बदतर हो चुकी है।
ग्रामीण एरिया की दुर्दशा तो बयान करने लायक ही नही है।
क्योंकि मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व के पास कोई भी न्यायोचित आर्थिक नीति बनाने वाले सुपात्र नेतृत्वकर्मी नही हैं।
होंगे भी कैसे जब केंद्रीय नेतृत्व हेतु जनता पिछले 2 पंचवर्षीय के लिए 544 सीटों पर सिर्फ मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को ही चुनती आ रही है।
वो भी ऐसा नेतृत्वकर्मी जो निपट अक्खड़ व गुमान से भरा हुआ एक अनपढ़ नासमझ और सर से पांव तक सडयंत्रकारिता का मास्टरमाइंड है।
जिसकी बाते झूठी, काम झूँठा, बोलबचन झूँठा, पूर्व का जीवन भी झूँठा, यहाँ तक कि शिक्षा भी झूँठी।
ऐसे व्यक्तिवाद से पीड़ित शख्सियत को 544 सीटों पर चुनेंगे तो परिणाम भुगतने ही पड़ेंगे नकारात्मक।
जब-जब किसी भी देश में नागरिकों की नासमझी के कारण किसी एक शातिर द्वारा लोकतंत्रीय शासनसत्ता व उसकी व्यवस्था को किसी एक व्यक्ति विशेष तक सीमित करने के षडयंत्र किये गए हैं तब-तब उस देश के 99% नागरिकों को भारी जान-माल की क्षति उठानी पड़ी है जिसकी शुरुआत मौजूदा भारतीय लोकतंत्र में हो चुकी है।
आज की न्यायोचित आर्थिक नीति से ही भविष्य का सामाजिक व राजनैतिक न्याय सुनिश्चित होता है।
जिस देश की जैसी आर्थिक नीति उस देश की वैसी ही सामाजिक व राजनैतिक दशा व दिशा तय होती है।
यह बात अब किसी से छुपी नही रही कि देश का लगभग प्रत्येक छोटा-मझोल व्यापारी/व्यवसायी/उद्यमी पूरी तरह से भारी मंदी की मार से जूझ रहा है उनके आशियाने तक बिकने की कगार पर हैं।
उनके आय के सभी स्रोत लगभग खत्म हो चुके हैं या कर दिए गए हैं अन्यायकारी नीतियों को थोपकर।
इसका मुख्य कारण सिर्फ एक ही है कि पुनः वही गलती दोहराई जा रही है जो सन 1913-14 से 1933 तक जर्मनी के नागरिकों द्वारा की गई थी तब उसके भुगतान हेतु जबरजस्ती पूरी दुनिया पर द्वतीय विश्वयुद्ध थोपा गया था।
तब भी नुकसान सिर्फ छोटे व मझोले आर्थिक सरोकार वाले सामाजिक लोगों का ताना-बाना ही तहस-नहस हुआ था।
आज भी वही होना शुरू हो चुका है।
अब भी वक़्त है सुधार किया जा सकता है बशर्ते देश की युवापीढ़ी समझदारी से मौजूदा नेतृत्व में शुचिता/पवित्रता लाने हेतु नेतृत्वकर्मियों से उनके विधानसभा व लोकसभा एरिया में चुनाव लड़ने आने से पहले उनका मानवजीवनविकास पर आधारित चारों विकासक्रम अर्थात 4Q’s (शारीरिक PQ/मानसिक IQ/भावनात्मक EQ/चेतनात्मक SQ) पर आधारित नेतृत्वकर्म की अहर्ता/क्षमता/सुपात्रता (मंत्रित्व, विधायन, निर्णयन) का परीक्षण पार्टी की स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा व Election Commission of India द्वारा परीक्षण किये जाने के बाद जारी किया हुआ प्रमाणपत्र सार्वजनिक किया जाना अनिवार्य हो।
तभी उसे DM/SDM आफिस में जाकर चुनाव लड़ने हेतु फॉर्म भरने की परमिशन मिले।
जिसदिन अपात्रों से भरी संसद व विधानसभाओ में सुपात्र नेतृत्वकर्मियों की संख्या बढ़ने लगेगी तब देश का आर्थिक, सांस्कारिक, व्यवहारिक, आध्यात्मिक अर्थात सामाजिक एवं राजनीतिक उत्थान होना सुनिश्चित होगा।
मौजूदा राजनीतिक पार्टियों में से एकलौती एक आमआदमीपार्टी ही है जो कमोवेश पूर्णरूप से न सही लेकिन 3C (करप्ट, क्रिमिनल, कैरेक्टर) पर आधारित स्क्रीनिंग करने के बाद ही अपने विधायक/सांसद पद के लिए कंडीडेट्स चुनावी मैदान में लोकप्रियता परीक्षण हेतु उतारती है।
आज हम युवाओं को गर्व है कि आमआदमीपार्टी में राजनैतिक सुचिता का पालन हो रहा है बाकी पार्टियों के बनिस्बत।
अब युवापीढ़ी उपरोक्त बातों पर विचार करे व अमल में लाये।
अन्यथा अपने बाप-दादाओं द्वारा विरासत में छोड़ी गई मानसिक गुलामी की जंजीर पहनकर सामूहिक नारकीय यातनाओं को भुगतती रहे।

✍ राम गुप्ता
(स्वतंत्र पत्रकार)
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आमआदमीपार्टी, उत्तरप्रदेश