डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
अगली सुबह कल्लूपुर में एक और खबर फैली।
गाँव के मास्टर रघुवीर की बेटी नीलम रात से गायब थी।
रघुवीर के घर में कोहराम मचा था।
नीलम उन्नीस साल की थी।
पढ़ने में तेज।
गाँव की लड़कियों से अलग उसके सपने थे। वह शहर जाकर पढ़ना चाहती थी।
रघुवीर ने कई बार कहा था—
“मेरी बेटी गाँव में नहीं रुकेगी।”
और शायद यही बात शरीफ को पसंद नहीं थी।
दो दिन पहले ही नीलम और शरीफ के बीच मजार के पास कहासुनी हुई थी।
नीलम ने उसे साफ शब्दों में कहा था—
“मुझे रास्ते में रोकना बंद करो।”
शरीफ ने हँसते हुए जवाब दिया था—
“बहुत शहर घूम आई हो?”
नीलम ने कोई जवाब नहीं दिया था।
मगर जाते-जाते उसने पलटकर कहा था—
“एक दिन तुम्हारा सच सबको बता दूँगी।”
यह बात वहाँ मौजूद दो लोगों ने सुनी थी।
अब नीलम गायब थी।
गाँव में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
किसी ने कहा—
“शहर भाग गई होगी।”
किसी ने कहा—
“किसी के साथ चली गई।”
मगर एक बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा—
“मजार के पास आखिरी बार देखी गई थी।”
बस।
इतना सुनना था कि शरीफ का नाम लोगों के मन में आया।
लेकिन किसी ने जुबान से नहीं लिया।
क्योंकि शरीफ अब सिर्फ शरीफ नहीं था।
वह फकीर शरीफ था।
रघुवीर सीधे मजार पहुँचा।
उसने शरीफ को देखते ही पूछा—
“मेरी बेटी कहाँ है?”
शरीफ ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे नहीं मालूम।”
“झूठ बोल रहा है।”
आसपास बैठे लोग चुप हो गए।
शरीफ ने रघुवीर की ओर देखा।
“मुझ पर इल्जाम लगाने से पहले सोच लेना।”
“सोच लिया है।”
रघुवीर की आवाज काँप रही थी।
“नीलम ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था।”
शरीफ का चेहरा निर्विकार रहा।
“क्या बताया?”
“कि तुम उसे परेशान करते हो।”
भीड़ में हलचल हुई।
शरीफ ने तुरंत अपनी आवाज धीमी कर ली।
“मास्टर, गुस्से में आदमी बहुत कुछ कह देता है।”
“मेरी बेटी गुस्से में नहीं थी।”
रघुवीर ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
“वह तुमसे डरती थी।”
पहली बार शरीफ चुप हुआ।
तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज आई—
“मास्टर जी सही कह रहे हैं।”
सबने पीछे देखा।
वह वही आदमी था जो पिछली रात मजार पर आया था।
शरीफ उसे देखते ही सन्न रह गया।
आदमी ने आगे बढ़कर कहा—
“और अगर नीलम नहीं मिली, तो अगली बारी किसी और की हो सकती है।”
“तुम कौन हो?” किसी ने पूछा।
उसने जवाब दिया—
“मेरा नाम जमील है।”
शरीफ ने तुरंत कहा—
“इसे यहाँ से निकालो।”
जमील मुस्कराया।
“डर गए?”
शरीफ की आँखों में पहली बार खुला हुआ डर दिखाई दिया।
उस दिन के बाद कल्लूपुर बदलने लगा।
लोग मजार पर आने तो लगे, मगर अब कुछ लोग शरीफ को गौर से देखने भी लगे थे।
उसकी बातों में छिपे अर्थ खोजे जाने लगे।
और सबसे बड़ी बात—
जमील गाँव में रुक गया।
वह कहाँ रहता था, कोई ठीक से नहीं जानता था।
कभी चाय की दुकान पर दिखता।
कभी पुराने कुएँ के पास।
कभी शाम को खेतों की मेड़ पर।
लेकिन हर बार उसकी निगाह मजार की तरफ होती।
तीसरे दिन उसने रघुवीर से कहा—
“आपकी बेटी को ढूँढना है तो घर में नहीं, मजार से शुरुआत करनी होगी।”
रघुवीर ने पूछा—
“तुम्हें क्या पता?”
जमील ने कहा—
“मुझे बहुत कुछ पता है।”
“तो बताओ।”
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन मैंने सब बता दिया, उस दिन शायद मैं जिंदा नहीं रहूँगा।”
रघुवीर सिहर गया।
उसी रात शरीफ अपनी कोठरी में बैठा था।
उसके सामने मिट्टी का एक पुराना दीया जल रहा था।
उसने दीवार के पास जाकर एक ईंट हटाई।
अंदर एक लोहे का छोटा संदूक रखा था।
उसने संदूक खोला।
उसमें पैसे, कुछ पुराने कागज, कई ताबीज और एक छोटी डायरी थी।
शरीफ ने डायरी खोली।
कई नाम लिखे थे।
कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।
कुछ के आगे निशान।
और कुछ के आगे सिर्फ एक शब्द—
“खत्म।”
उसने तेजी से पन्ने पलटे।
फिर एक जगह आकर रुक गया।
उस पन्ने पर नीलम का नाम लिखा था।
नाम के नीचे तारीख थी—
बारह साल पुरानी।
शरीफ की साँस अटक गई।
“नहीं…”
उसने पन्ना पलटा।
अगले पन्ने पर वही नाम फिर था।
इस बार उसके नीचे एक और नाम लिखा था।
जमील।
शरीफ ने डायरी बंद कर दी।
तभी कोठरी के बाहर किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
वह चौंककर बाहर निकला।
कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर एक कागज पड़ा था।
शरीफ ने उसे उठाया।
कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“जिसे तुमने बारह साल पहले दफनाया था, वह अब लौट आया है।”
शरीफ की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उसने चारों ओर देखा।
दूर पीपल का पेड़ हवा में हिल रहा था।
अगली सुबह मजार के पीछे खुदाई शुरू हुई।
यह काम जमील ने करवाया।
रघुवीर ने पूछा—
“यहाँ क्यों?”
जमील ने जमीन की ओर इशारा किया।
“क्योंकि यहीं से बदबू आती है।”
मजदूरों ने फावड़ा चलाना शुरू किया।
पहली परत में मिट्टी।
दूसरी में पत्थर।
फिर कुछ पुरानी लकड़ियाँ।
अचानक एक मजदूर का फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया।
ठक!
सब रुक गए।
जमील आगे बढ़ा।
मिट्टी हटाई गई।
नीचे लोहे का एक पुराना डिब्बा दिखाई दिया।
रघुवीर ने घबराकर पूछा—
“क्या है इसमें?”
जमील ने कहा—
“जो कुछ भी है, वह इस गाँव का सबसे बड़ा राज हो सकता है।”
डिब्बा खोला गया।
अंदर पुराने कागज थे।
कुछ तस्वीरें।
और एक कपड़े में लिपटी हुई चीज।
रघुवीर ने काँपते हाथों से पहली तस्वीर उठाई।
तस्वीर बहुत पुरानी थी।
उसमें पाँच आदमी खड़े थे।
उनमें एक जवान शरीफ भी था।
दूसरा जमील।
तीसरे को देखकर रघुवीर की आँखें फैल गईं।
“ये…?”
जमील ने कहा—
“हाँ।”
तस्वीर में पीर बाबा की मजार के पुराने सज्जादानशीन खड़े थे।
लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।
जमील ने उसे पढ़ा।
उसका चेहरा कठोर हो गया।
“क्या लिखा है?” रघुवीर ने पूछा।
जमील ने कागज उसकी तरफ बढ़ा दिया।
उस पर लिखा था—
“मजार के नीचे जो दबा है, अगर वह बाहर आया तो शरीफ की फकीरी खत्म हो जाएगी।”