चुनावी राग-रंग― एक
शातिर देखो हर जगह, रहे लगाते दावँ
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
सारे बिल हैं खुल गये, उछल-कूद है रोज़।
ज़ोर मारते हर जगह, घर-घर करते खोज।।
दो―
कल तक अता-पता नहीं, अब हैं चारों ओर।
नाक रगड़ते हर जगह, रात बिताये भोर।।
तीन–
शातिर देखो हर जगह, रहे लगाते दावँ।
एक बटन की चाह मे, दबा रहे हैं पावँ।।
चार–
टोली नंगों की यहाँ, घूम रही हर ओर।
गिरगिट रंग बदल रहे, होता घर-घर शोर।।
पाँच–
हम तो मस्तमलंग बन, मारेंगे घर मौज़।
असरहीन हम हो चुके, भेजो घर मे फ़ौज।।
छ: –
हरिश्चन्द-संतान-सम, करें घोषणा लोग।
जनता मरती भूख से, सुरा-सुन्दरी-भोग।।
सात–
वादों की खेती यहाँ, तरह-तरह के बीज।
बाँझ पैदावार हुई, होती मन मे खीज।।
आठ–
मौसम भी है रँग गया, उठे चुनावी घोष।
सब मिल नौटंकी करें, मन मे उठता रोष।।
नौ–
पहला कहता चोर है, कहे दूसरा भाँड़।
चलते सीना तानकर, दिखते मानो साँड़।।
दस–
सब अपनी पहचान ले, ओढ़ देह पर खाल।
भोले-भाले दिख रहे, मिलकर काटें माल।।
ग्यारह–
कोई माँगे धर्म पर, माँगे कोई जाति।
अगड़े-पिछड़े माँगते, दूजा माँगे पाति।।
चुनावी राग-रंग― दो
मनमाना गृहकर बढ़े, जलकर की भी बाढ़
एक–
कैसे हम नेता कहें, बहुरुपिये हर ओर।
थमा झुनझुना हाथ मे, बदलें अपनी छोर।।
दो–
वाद-युक्त समाज यहाँ, दिखते
पिछड़ेबाज़।
बाभन-ठाकुर लड़ मरें, हुँकारें भीमबाज़।।
तीन–
खण्डित करें समाज को, मिलकर चौकीदार।
खटकाये लाठी भले, सजग रहो हर बार।।
चार–
कोई ख़ुद को राम कह, कहे रहीमा कोय।
अवसरवादी हर जगह, लम्पट-लुच्चे होय।।
पाँच–
गली दुर्दशा झेलती, कूड़ा चारों ओर।
नाली अता-पता नहीं, घूमेँ आदमख़ोर।।
छ: –
सड़क फफकती दिख रहीं, लिये बदन पर घाव।
नेता निर्मम इस तरह, जगे न कोई भाव।।
सात–
अधिकारी भी मस्त हैं, रिश्वत का है खेल,
जनता बेचारी दिखे, कहीं न कोई मेल।।
आठ–
मनमाना गृहकर बढ़े, जलकर की भी बाढ़।
सुनवायी कोई नहीं, बढ़ता जैसे डाढ़।।
नौ –
बन पार्षद भूल गये, किसकी कैसी बात।
धोखेबाज़ी हर जगह, करते बढ़कर घात।।
दस–
महापौर-पद पा गये, वादे होते दूर।
साँप सूँघ जनता गयी, चिड़िया होती फुर्र।।
ग्यारह–
रामनाम की आड़ ले, माँग रहे हैं वोट।
मदिरा लेकर घूमते, बाँट रहे हैं नोट।।
चुनावी राग-रंग― तीन (अन्तिम)
सूरत-सीरत समझकर, बटन दबाना हाथ
एक–
दल-बदलू हैं हर जगह, ख़त्म हुआ विश्वास।
कथनी-करनी दूर हैं, किस पर कैसी आस।।
दो–
मौक़ा नाज़ुक जानते, छान रहे हैं ख़ाक।
याचक लगते हैं सभी, प्रश्न यहाँ है नाक।।
तीन–
मतदाता हैं देखते, जाति-पाति औ’ धर्म।
नहीं समझते हैं यहाँ, अपना अस्ली कर्म।।
चार–
दोषी मतदाता दिखें, लगते बहुत अबोध।
क्यों चुनाव है किसलिए, नहीं करेंगे शोध।।
पाँच–
हुल्लड़बाज़ी हर जगह, हर सू है बेचैन।
गुण्डा कोई दिख रहा, बोले उलटे बैन।।
छ: –
कितना गिरा समाज है, कैसे-कैसे लोग।
साथ दे रहें पाप का, करें रूपसी भोग।।
सात–
बिकेंगे पार्षद यहाँ, महापौर की चाल।
मतदाता-उपहास कर, सब मिल काटें माल।।
आठ–
“मेरी नाली बन्द है, सड़क बहुत बेहाल।”
सन्न रहोगे देखकर, सुनवाई मे घाल।।
नौ–
दशक कई हैं बीतते, ठगता है माहौल।
फ़रियादी टहला रहे, उड़ा-उड़ा माख़ौल।।
दस–
विषम समय है आ खड़ा, जीवन बना सवाल।
नगरनिगम पर प्रश्न हैं, कोई नहीं हवाल।।
ग्यारह–
सूरत-सीरत समझकर, बटन दबाना हाथ।
वर्ना फिर पछताओगे, हाथ धरोगे माथ।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ मई, २०२३ ईसवी।)