––० डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ०—

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
संसद् का है बड़बोला,
इधर सुरा, उधर सुन्दरी,
भोग लगाये गोला।
फगुनाहट की छायी मस्ती,
ज़हर है देश में घोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
महुआ रानी ज्यों बौरायीं,
खुल गया सबका झोला।
इधर है रम्भा, उधर उर्वशी,
मन अब सबका डोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
राग-रंग नेता-नेतिन की,
क्या-क्या सबने खोला!
शैतानी ये हरकत कैसी,
बटोर लिया है टोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
राष्ट्रधर्म अवाक् है कैसा!
कपट-द्वार है खोला।
दोहा-चौपाई सब भूला,
रचता है अब रोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला।।