★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
धीके लागल ए बबुआ! तहार नगरी,
देख छलकत बा कइसे हमार गगरी।
ए बिधाता के रचना जियान कइल तू,
हेने अइह मत, पकड़ होने के डगरी।
एही करनिया से करिखा पोताइ लेहल,
सोचबो करिह ना आवे के हमार कगरी।
कटवइले फेड़वा रहतिया के मिलि-जुलि के,
लागे लागल अब चीरीं तहार टँगरी।
गिरगिट-लेखा उतान कइसे चल ल तू,
थू-थू होखे अब लागल तहार सगरी।
फरका रहि के तनी तू अब सोचल कर,
कहीं उछले ना लागे अब तहार पगरी।
राजा-परजा सिक्का के एगो रूपवा हवे,
मउका पाई जब जनता तहरा के रगरी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)