
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आप यदि वास्तव में, अपनी रचनाशीलता को जीते हैं और भोगते हैं तो आपकी उपयोगिता और महत्ता सार्वकालिक है, क्योंकि ईमानदार शब्दधर्मी की सार्वत्रिक प्रतिष्ठा होती है। निस्सन्देह, वह विनम्र होता है, परन्तु आत्माभिमान की ‘प्रतिमूर्ति’ है। यही कारण है कि सम्पूर्ण सांसारिक शक्तियाँ उसके सम्मुख नतमस्तक होती आ रही हैं।
उसकी मनसा-वाचा-कर्मणा परिशुद्धता उसे सर्जन के शीर्ष शिखर पर समासीन करती है। यह भी सत्य है, उसके साथ भौतिकता ठहर नहीं पाती, कारण कि उसकी सात्त्विकता के समक्ष राजसी और तामसिक वृत्तियाँ करबद्ध मुद्रा में उपेक्षित पड़ी रहती हैं।
प्राय: उसकी सदाशयता, सहिष्णुता सहजता तथा सौमनस्य को समाज ‘अकिंचनत्व’ के रूप में देखने का अभ्यस्त रहा है, जो उसकी भूल रही है। सत्य यह है कि निष्ठावान् कर्मयोगी सर्जक की शब्दशक्ति की प्रखरता इतनी गतिशील है कि वह क्षणभर में दावानल, बड़वानल इत्यादिक आपदा का प्रकोप-दर्शन करा सकता है।
कर्त्तव्यपरायण लेखनधर्मिता ‘अरण्यरोदन’ नहीं करती, प्रत्युत धीर-गम्भीर वाच्यार्थ को प्रतिबिम्बित कर, अपनी अभिनव अवधारणा आरम्भ करती है।
समाज को ऐसे विलक्षण शब्दशिल्पी-मण्डल से लोकहित में कुछ ग्रहण करना है तो विनयशील-भाव के साथ नतमस्तक होना होगा, अन्यथा ऐसे मनस्वी समय-सत्कार को अंगीकृत कर, नियति-पथ पर अग्रसर हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ६ अप्रैल, २०१८ ई०)