भूमिसुता का मौन और प्रकृति का शोर
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वन की वह संध्या अत्यन्त विलक्षण थी। आकाश पर धूसर मेघों की पतली परतें तैर रही थीं। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था, पर उसकी लालिमा मानो धरती के हृदय […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वन की वह संध्या अत्यन्त विलक्षण थी। आकाश पर धूसर मेघों की पतली परतें तैर रही थीं। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था, पर उसकी लालिमा मानो धरती के हृदय […]
उस समय हमारे पूरे मोहल्ले में एक ही टेलीविजन हुआ करता था– ब्लैक एंड ह्वॉइट, लकड़ी का शटर वाला । तब चैनल के नाम पर टीवी पर सिर्फ दूरदर्शन आता था। रामानंदकृत रामचरितमानस का प्रसारण […]