तीर्थराजप्रयाग-महाकुम्भदर्शन– दो

तीर्थराज प्रयाग-महाकुम्भ का प्रथम स्नानपर्व 'पौष-पूर्णिमा'

इन दिनो प्रयागराज मे एक ऐसा उत्साह है; उमंग है तथा चहल-पहल है, जो अनिर्वचनीय है। जिज्ञासा, कुतूहल एवं उत्सुकता बाँधे नहीँ बँधती। एक प्रकार से आस्था का प्रतीक, तीर्थराज प्रयाग मे मासपर्यन्त आयोजित महाकुम्भपर्व के अवसर पर देश-देशान्तर से पधारनेवाले श्रद्धालुओँ का आगमन आरम्भ हो चुका है। संगम-क्षेत्र मे पहुँचते ही तम्बुओँ की एक मनोरम नगरी सर्वत्र दिखने लगती हैँ, जो आँखोँ को बहुत भली लगती है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो मनुष्य एक ऐसे लोक मे पहुँच चुका हो, जहाँ केवल ईश्वरीय शक्ति का प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा हो। वस्तुत: यह एक विलक्षण संयोग है, जहाँ श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था पग-पग पर अपने होने का अनुभव करा रही होँ और सम्पूर्ण वातावरण मन्त्रमुग्ध हो चला हो। यह वही मनोरम एवं पावन स्थल है, जहाँ कर्म, भक्ति एवं ज्ञान का संगम है और त्रिवेणी प्रवहमान है। हम गंगा को कर्म, यमुना को भक्ति एवं अदृश्य सरस्वती को ज्ञान के रूपक मे निबद्ध कर सकते हैँ।

प्रयाग-क्षेत्र कर्म का प्रतीक है। छ: प्रमुख स्नानपर्वोँ मे से पौषमास वह पहला स्नान है, जहाँ से स्नानार्थी, विशेषत: मासपर्यन्त निर्धारित कुटिया मे रहनेवाले कल्पवासी अपने कल्प का आरम्भ करते हैँ, जिसका समापन शिवरात्रि-स्नान होता है। पौष-पूर्णिमा का दिवस पौषमास का अन्तिम दिवस होता है। साधु-साध्वी-संतादिक पौष-पूर्णिमा के अवसर पर ही ‘सात्त्विक स्नान’ (शाही स्नान) आरम्भ होता है, जिसे कुम्भ का ‘प्रथम स्नान’ भी कहा गया है।

१३ जनवरी, २०२५ ई०, दिन सोम, मास-तिथि पौष-पूर्णिमा महाकुम्भ-स्नान का प्रथम पर्व है। पंचांग निर्देश करता है कि पूर्णिमा-तिथि का आरम्भ १३ जनवरी, २०२५ ई० को ब्रह्ममुहूर्त्त मे ५ बजकर ३ मिनट से हो जायेगा एवं उसका समापन १४ जनवरी को प्रात: ३ बजकर ५६ मिनट पर होगा। यही कारण है कि पौष-पूर्णिमापर्व का आयोजन १३ जनवरी, २०२५ ई० को किया जायेगा। हमारे पौराणिक ग्रन्थोँ मे इस स्नानपर्व की उपयोगिता-महत्ता को विधिवत् बताया और समझाया गया है। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है कि संगम के पवित्र सितासित (संगम– गंगा-यमुना) जल मे जलावगाहन करने से मनुष्य नीरोगी कायासहित पुण्य का भागी होता है; क्योँकि संगम-जल मे प्राणदायिनी शक्ति विद्यमान रहती है। इसी तिथि से माघमास के स्नान का शुभारम्भ होता है।


पौष-पूर्णिमा का माहात्म्य : एक दृष्टि मे–

● पौष-पूर्णिमा १३ जनवरी, २०२५ ई० को ब्रह्ममुहूर्त्त मे ५ बजकर ३ मिनट से आरम्भ होगी, जो १४ जनवरी, २०२५ ई० को तड़के भोर मे ३ बजकर ५६ मिनट पर समाप्त होगी।
● प्रात: ५ बजकर २७ मिनट से ६ बजकर २१ मिनट तक स्नान एवं दान करने का मुहूर्त्त निर्धारित है।
● पूर्वाह्ण ९ बजकर ५३ मिनट से ११ बजकर ११ मिनट पूर्वाह्ण तक सत्यनारायण भगवान् की पूजा-आराधना करने का मुहूर्त्त निर्धारित है।
● चन्द्रमा-पूजन के लिए १३ जनवरी, २०२५ ई० को अपराह्ण ५ बजकर ४ मिनट से निर्धारित है; क्योँकि पंचांग के अनुसार, चन्द्रोदय का समय यही रहेगा।

● लक्ष्मी-पूजन-आराधनहेतु १३ जनवरी, २०२५ ई० को विलम्ब रात्रि १२ बजकर ३ मिनट से १२ बजकर ५७ मिनट तक समय निर्धारित है।

  स्नान करने के पश्चात् सूर्य और चन्द्रमा की आराधना करने का विधान है। इससे जीवन मे आयीँ और आनेवाली समस्त विघ्न-बाधाओँ की समाप्ति हो जाती है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। पौष-मास का विशेष महत्त्व है; क्योँकि इस मास मे मध्यरात्रि मे की जानेवाली साधना त्वरित सिद्धि को प्राप्त होती है। इस अवसर पर श्रद्धालु लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पीपल-वृक्ष का पूजन करते हैँ। ऐसी मान्यता है कि वैसा करने से लक्ष्मी देवी प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करती हैँ। पौराणिक ग्रन्थोँ मे उल्लेख है कि पौष-पूर्णिमा के अवसर पर पवित्र नदियोँ मे स्नान करने से मनुष्य सांसारिक बन्धन से मुक्ति पा, 'मोक्ष' का भागी बनता है। इस अवसर पर चार प्रमुख शक्तिपीठ :– प्रयाग, हरद्वार, नासिक एवं उज्जैन की पवित्र नदियोँ मे स्नान करने की मान्यता है। ऐसा भी कहा गया है कि मनुष्य तीर्थराज प्रयाग के कुम्भ-अवसर पर संगम मे स्नान करने से सांसारिक गमनागमन ('आवागमन' अशुद्ध है।) के बन्धन से मुक्त हो जाता है; क्योँकि तब 'मोक्ष-द्वार' अनावृत हो जाते हैँ तथा उसे अनन्त काल तक पुण्य का लाभ प्राप्त होता रहता है।

इस पौषमास को 'खरमास' भी कहते हैँ। खर का अर्थ 'दुष्ट' होता है और मास का 'महीना'; अर्थात् खरमास 'दुष्टोँ का महीना' होता है। जैसाकि हम जानते हैँ कि दुष्टोँ का स्वभाव ही होता है, 'किसी के बनते हुए काम को बिगड़ देना' तथा 'अनायास किसी को कठिनाई मे डाल देना'। यही कारण है कि जनमानस दुष्टोँ से डरता है। पौषमास का भी कुछ ऐसा ही स्वभाव है, जिसके कारण इस मास मे शुभकर्म नहीँ किये-कराये जाते। जितने भी सामाजिक मांगलिक कार्य होते हैँ, उन्हेँ पौषमास मे न किये जाने का निर्देश है। मुण्डन, उपनयन एवं विवाह-संस्कार, गृहप्रवेश आदिक शुभकर्म किये जाने को निषिद्ध किया गया है। यदि ज्योतिर्विज्ञान पर विश्वास किया जाये तो उसके अनुसार, जैसे ही ग्रहोँ का राजा सूर्य परिक्रमा करते-करते, पौषमास मे धनुराशि मे प्रवेश करता है वैसे ही 'खरमास' आरम्भ हो जाता है, जोकि शुभ नहीँ माना जाता। इसके कुप्रभाव से बचने के लिए सूर्य, भगवान् विष्णु एवं पितृगण (पितरोँ) का पूजन-अर्चन-आराधन किया जाता है। अब प्रश्न उठता है– इस खरमास से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? इसका उत्तर है– जैसे ही सूर्य धनुराशि से निकलकर मकरराशि मे प्रवेश करता है वैसे ही पौषमास की समाप्ति हो जाती है और खरमास से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। हम इसे ही 'मकरसंक्रान्ति' कहते हैँ। पौषमास मे व्रत करने का विधान है। सूर्यदेव की आराधना करने का निर्देश है।

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