● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मै कल (१५ मार्च) को ब्रह्म मुहूर्त्त मे ४.२३ बजे गुवाहाटी (असम) रेलस्टेशन (‘रेलवे स्टेशन’ अशुद्ध है।) के प्लेटफ़ॉर्म-क्रमांक चार पर बैठा था, तभी एक वयोवृद्धा पर दृष्टि स्थिर हो गयी। वह ‘सिगरेट’ को शाही अन्दाज़ मे अपनी अँगुलियों मे दबाकर यों धूमपान (‘धूम्रपान’ अशुद्ध है।) कर रही थी, मानो अपने अतीत के हर कालखण्ड को धुएँ मे उड़ाकर हर शिकवा-शिकायत-गिला से मुक्त होकर ‘उन्मुक्त पंछी-सा’ स्वच्छन्द विचरण करना चाह रही हो। उसके अधर स्फुरित हो रहे थे और मौन शब्द ‘निश्शब्द’ के कोश को समृद्धतर किये जा रहे थे।
मेरे मोबाइल फ़ोन का चलचित्रांकक (चलचित्र कैमरा) मचलने लगा। अवसर अनुकूल था। मेरी भावना और संवेदना भी बलवती होती रही; अन्तत:, मैने उस अज्ञात महिला की प्रत्येक भावभंगिमा को बन्दी बना लिया था।
उस वयोवृद्धा की क्रियाशीलता के साथ मेरा आँखों-देखा विवरण भी ध्वन्यांकित होता रहा; परन्तु स्वर भी संवेदना की घनीभूत अनुभूति से इस भाँति प्रभावित होता रहा कि वह मौन व्यथाकथा स्वर पर भारी था।