आकांक्षा मिश्रा– 
इन विगत
वर्षों में
अनगिनत सवालों ने बहुत परेशान तुम्हे
परेशानिया उठाई नही
कुटिल मुस्कान नई चालें चल रही थी
अगले दिन के लिए
मुग्धा अनायाश भटक रही थी
ओट में
चाहों में तुम दीवार खड़ी कर सको या पटलने अपार
औरत जब जबाब के लिए खड़ी होती है
विचलित नही होती
यूँ भटके हुए सारे द्वार बड़े असाध्य करते हैं
देखती हूँ
कुछ पुराने पन्ने को आस्था की नदी में विप्लव बनकर
पूजा की अंतिम धूप महकाई गई खैरियत के लिए
अपनत्व भाव कम हो गए परिवर्तित हो गए सफलता की अंतिम गोद में
परिणय हुए तमन्ना की राह में
अपने पते भटके क्यों रही बनकर सदियों से
पथिक आज तमन्ना होड़ में
कारवां की दास्ताँ अजीब सी
परवाह की एक चादर नीली -पीली और समन्यवय के हजार रंक भरने के लिए अंक में
पुनः प्रकोष्ठ में फैलती प्रकाशपुंज निहार लेती आभा मण्डल को
यूँ की बार सारतत्व निहित वेद के सार तत्व जीवन के उपक्रम दर्पण बनकर परिलक्षित हुए
मध्यस्थ सहमार्गी अवस्थाओं से कितने खून बहे तन्मयता के जीवन-दर्शन के विभा में
साक्ष्य ढूंढ रहे हो परिनिर्वाण के लिए या जीवन व्यवहार के लिए
अतीत ठुकरा दिया जाता है विकास के आलम्बन में समीपता की भिन्नता में
फिर देखे जीवन के कुछ रंग पीताम्बर में
उत्तरदायी तुुम्हारी जीवनधारा है ।