‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज का आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद-समारोह सम्पन्न
‘बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक संस्था ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद समारोह का आयोजन १२ अक्तूबर को ‘सारस्वत सदन’, आलोपीबाग़, प्रयागराज से किया गया, जिसमे देश के कई विचारकोँ की सहभागिता रही।
समारोह मे अध्यक्षता करते हुए, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के संरक्षक श्री विभूति मिश्र ने कहा, “शताब्दियोँ से मनुष्य अपने अन्तस् मे वैमनस्य, द्वेष, अहम्मन्यता, मात्सर्य, ईर्ष्या इत्यादिक विकारोँ को भरे हुए जी रहा है। उन्हेँ समाप्त करने के स्थान पर वह उनमे प्रतिपल बढ़ोतरी करता आ रहा है। यही कारण है कि उसके भीतर की आसुरी प्रवृत्ति समाप्त होने का नाम नहीँ ले रही है।”

परिसंवाद-आयोजक, भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, "रावण की पापबुद्धि सबमे व्याप्त है। उसकी इच्छा, महत्त्वाकांक्षा इतनी प्रबल रहती हैँ कि वह "एकोSहम् द्वितीयोनास्ति" को जीता आ रहा है। आज लगभग प्रत्येक व्यक्ति चरित्र-स्तर पर दुर्बल और शिथिल दिख रहा है। यही कारण है कि वह अपने भीतर के रावण को मारने की जगह निर्जीव पुतले का दहन कर, अपने कृत्रिम पुरुषार्थ का परिचय देता आ रहा है।"
डॉ० सूर्यकान्त त्रिपाठी (सहायक प्राध्यापक– दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर) ने कहा, “विकासवाद की अन्धी दौड़ मे मनुष्य के आत्मावलोकन की प्रवृत्ति तिरोहित होती जा रही है। आत्मावलोकन के द्वारा दुष्प्रवृत्ति रूपी रावण का दहन सम्भव है। आज सम्पूर्ण विश्व सांस्कृतिक प्रदूषण से कराह रहा है। हम सबको उदात्त जीवन-मूल्योँ का निरूपण अपने व्यक्तित्व मे करना होगा, तभी मानवता का रक्षण सम्भव है।”
श्री निशा पाण्डेय (सहायक अध्यापक, प्रयागराज) का विचार है, “रावण इतना मदान्ध हो चुका था कि अनेक देवताओँ को अपने अधीन कर रखा था। यही मदान्धता मनुष्य को उसके भीतर के रावण को मारने नहीँ देती और वह प्रतिवर्ष अपने भीतर के रावण को जलाने का विफल प्रयास करता आ रहा है।”
डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय (सहायक प्राध्यापक– मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर) ने बताया, “जब तक हम अपने अन्दर के रावण का दहन नहीँ करेँगे तब तक बाहर के रावणरूपी पुतले को जलाते रहने से एक अच्छे समाज का निर्माण नहीँ कर सकेँगे। एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए हमे अपनी बुराइयोँ के प्रति सतर्क रहना पड़ेगा और उन्हेँ जड़ से उखाड़ फेँकना होगा।”
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ (हरदोई) ने कहा, ” मनुष्य को श्रेयानस्वधर्मो” की बात मिथ्या प्रतीत होती है। हम कर्म और कान के कच्चे हैँ। राम की बात करते हुए भी हम रावण का अनुसरण करते हैँ। रावण दोहरे चरित्रवाला एक प्रतिनायक है, ठीक उसी भाँति आज का प्रत्येक व्यक्ति दोहरा चरित्र को जीते हुए, अपने भीतर के ‘रावण’ को ढोता आ रहा है।”
श्री आदित्य त्रिपाठी (सहायक अध्यापक, बे०शि०वि०/अध्यक्ष– महर्षि विवेकानन्द ज्ञानस्थली, हरदोई) ने बताया, “सत्ता-मद अथवा अन्य मद मे चूर व्यक्ति स्वयं को ही श्रेष्ठ समझने लगता है। श्रेष्ठता का यही भ्रम उसके अन्तस् मे ‘रावण’ उत्पन्न कर देता है, फिर वह अपने मन मे उत्पन्न सद्विचाररूपी विभीषण का त्याग कर, उसका दमन कर देता है, फलस्वरूप उसके मन मे रामरूपी अग्नि का प्राकट्य नहीँ होता और वह रावण को जला नहीँ पाता।”