‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय
— पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश की मूलभूत समस्याएँ वहीं-की-वहीं मुँह बाये खड़ी हैं। आइए! समझते हैं :—-
★ कोई भी काम कराने के लिए दलालों की मुट्ठी गरम करना।
★ विकृत और कुत्सित शिक्षापद्धति।
★ सामाजिक दुरवस्था।
★ हिन्दू-मुसलमान की घिनौनी राजनीति करते हुए समाज को आतंकित करना।
★ रुग्ण शासकीय चिकित्सा-व्यवस्था।
★ हनुमान् की पूँछ बनती बेरोज़गारी।
★ देश के शिक्षित युवावर्ग के भविष्य के साथ हास्यास्पद ‘खेल’ खेलना।
★ सुरसा के मुख की तरह फैलती भ्रष्टाचार-बेईमानी-रिश्वतख़ोरी।
★ तरह-तरह के अमानवीय अपराधों में वृद्धि।
★ देश की जनता से भाँति-भाँति के करों के रूप में प्राप्त राजस्व का शासकीय दुरुपयोग।
★ असन्तुलित और शोचनीय आर्थिक स्थिति।
★ न्यायालयों में न्यायाधीशों की बड़ी संख्या में कमी।
★ सिपाहियों, दारोगाओं तथा अन्य पुलिस-अधिकारियों की बड़ी संख्या में अभाव।
★ शिक्षाजगत् में प्राथमिक शाला से लेकर उच्च शिक्षा तथा प्राविधिक शिक्षा-प्रशिक्षा के लिए विशेषज्ञ शिक्षकों की बड़ी संख्या में अभाव।
★ अनधिकृत रूप से राजनीतिक तुष्टीकरण की नीति।
★ अन्य विसंगतियाँ।
इन सबसे निबटने के लिए केन्द्र और राज्य की सरकारों ने अभी तक गम्भीरतापूर्वक कार्य नहीं किये हैं। क्षुद्र स्वार्थ और सत्ता की घृणित राजनीति ही दिखती आ रही है। किसी भी स्तर तक गिरकर सत्ता हथियाने के अतिरिक्त और कोई उद्देश्य नहीं। यही कारण है कि लोकमंगलकारी योजनाओं को क्रियान्वयन् करने के स्थान पर, देश की जनता को तरह-तरह की भावनाओं में बाँधकर ‘दिव्यांग’ बना दिया जा रहा है। जनता भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को विस्मृत कर, नचनिया राजनीति के साथ कमर लचका रही है।
देश का प्रबुद्धवर्ग यह जानना चाहता है, सत्ताधारियों के लिए उनके ‘दल’ सर्वोपरि हैं अथवा ‘देश’?
(सर्वाधिकार सुरक्षित : पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ मार्च, २०२० ईसवी)