अपने मूल मार्ग से भटक रहे काँवरयात्री!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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आस्था, श्रद्धा और विश्वास मन-प्रधान होता है, न कि तन-प्रधान। “मन चंगा तो कठौती मे गंगा” को योँ ही नहीँ कहा गया है। इतना ही नहीँ, परम ईश्वरीय शक्ति विष्णु ने नारद के एक प्रश्न पर उत्तर दिया था :–
“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च,
मद्भक्ता यत्र गायन्ति, तिष्ठामि तत्र नारद!”
(हे नारद! न मै वैकुण्ठ मे वास करता हूँ और न ही योगियोँ के हृदय मे। मेरा भक्त जहाँ मेरा गायन करता है/स्मरण करता है वहाँ विद्यमान रहता हूँ।)
यदि स्वयं को हिन्दू, सनातनी, भगवाधारी आदिक कहनेवाले और परम भक्त का टीका लगाकर घूमनेवाले लोग विष्णु के ही कथन की अवहेलना करेँ तो इसे एक घोर विडम्बना की ही संज्ञा दी जायेगी; क्योँकि किसी सम्प्रदाय की ईश्वरीय शक्ति मनुष्य के अन्त:करण मे वास करती है, इसीलिए अन्त:करण को सर्वाधिक पवित्र माना जाता है।
अब यहाँ प्रासंगिक विषय ‘काँवर-काँवरिया’ से जुड़ा हुआ है।
हम यहाँ प्रथमत: ‘काँवर’ और ‘काँवरिया’ का शब्द-विवेचन करेँगे। वस्तुत: ‘काँवर’ हिन्दी-शब्द ‘काँध’ और प्रत्यय ‘अवर’ का योग है। इसे संस्कृत मे ‘स्कन्धभार’ कहा जाता है। ‘काँध’ का अर्थ ‘कन्धा’ है। ‘काँवर’ को ‘बहँगी’ भी कहा जाता है। इसी काँवर से ‘कहाँर’ शब्द का भी गठन होता है। जो दुल्हा-दुल्हन को पालकी मे ले आने और ले जाने का काम करते हैँ, वे ‘कहाँर’ कहलाते हैँ। ‘काँवर’ का जो ‘क’ वर्ण है, उसका अर्थ ‘ब्रह्म’ माना गया है, जिसमे त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की स्थिति मानी गयी है, जो उसमे रमण करता है।
कहने-समझने के लिए ‘काँवर’ एक सामान्य शब्द है; जबकि इसकी पवित्रता से बहुत कम लोग परिचित होते हैँ। इसका बोध तब होगा जब हमारा पाठकवर्ग इसकी विविधता का बोध करता है। काँवर चार प्रकार के होते हैँ, जिनके नाम और काम भिन्न-भिन्न रहते हैँ। चारोँ प्रकार के काँवर धरती से न छुएँ, इसके प्रति काँवर-धारक को पूर्णत: सजग और सतर्क रहना पड़ता है। वे चारोँ प्रकार हैँ :– (१) सामान्य काँवर (२) डाक काँवर (३) खड़ी काँवर (४) दाण्डी काँवर।
(१) सामान्य काँवर :– यह वह काँवर है, जिसे सामान्य रूप से आस्थालु ढोते हैँ। इसमे काँवर-धारक अपने (यहाँ ‘अपनी’ अशुद्ध है।) सुविधानुसार ठहर सकते हैँ।
(२) डाक काँवर :– इसे ढोनेवाले वे काँवरिये होते हैँ, जो शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने तक निरन्तर चलते रहते हैँ। उनकी यह अविराम यात्रा लगभग २४ घण्टे की रहती है, जोकि दुष्कर होती है, कारण कि उस यात्रावधि मे किसी प्रकार की शारीरिक उत्सर्जन की क्रिया तक वर्जित मानी गयी है।
(३) खड़ी काँवर :– इस यात्रा के अन्तर्गत एक सहयोगी साथ रहता है। जब मुख्य काँवर-धारक थक जाता है तब उसके साथ चलनेवाला व्यक्ति उस काँवर को अपने कन्धे पर रखकर उसे चलते रहने की शैली मे इसप्रकार से हिलाता-डुलाता है, मानो यात्रा खण्डित न हुई हो।
(४) दाण्डी काँवर :– यह सर्वाधिक कष्टसाध्य यात्रा कहलाती है; क्योँकि इसमे कोई काँवर नहीँ रहता। इसे दाण्डी इसलिए कहा जाता है कि उस यात्रा को करनेवाला व्यक्ति गंगानदी-तट से शिवालय तक की यात्रा लेटकर बढ़ते हुए पूर्ण करता है, जिसमे लगभग एक माह की अवधि लग जाती है।
यहाँ स्वयं को ‘काँवड़िया’ कहनेवाले लोग के लिए जानना ज़रूरी है कि गंगानदी वा फिर गंगानदी-जल मे मिलनेवाली सहायक नदियोँ के जल लेने के अनन्तर काँवर-धारकोँ को स्वच्छ वस्त्र धारण कर, कई मार्गोँ से १०५ किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।
भारतीय समाज मे ‘काँवर-यात्रा’ श्रावण (सावन)-मास की एक पावन यात्रा मानी गयी है, जोकि आस्था का विषय है। ऐसी मान्यता है कि इस यात्रा का एकमात्र उद्देश्य गंगानदी से जल लाकर अपने-अपने क्षेत्र मे शिवालय-स्थित शिवलिंग पर जल चढ़ाना होता है। इस जल चढ़ाने के पीछे इतनी स्पर्द्धा रहती है कि अपार-सी दिखती भीड़ मे भगदड़ तक मच जाती है, जिससे बड़ी संख्या मे जल चढ़ानेवाले लोग हताहत हो जाते हैँ। श्रावण-मास विगत ११ जुलाई से प्रारम्भ हो चुका है और काँवर ले जाने की शुरूआत (‘शुरुआत’ अशुद्ध है।) भी, जो श्रावणमास की शिवरात्रि की तिथि मे आगामी २३ जुलाई को समाप्त होगी।
‘आनन्द रामायण’ मे एक प्रसंग है, जिसके अन्तर्गत कहा गया है कि राम ने काँवरिये का रूप धारण कर, सुलतानगंज से गंगाजल लिया था, जिसे देवघर-स्थित वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाया था। यही कारण है कि सुलतानगंज से प्राथमिकता के साथ जल लिया जाता है। हरिद्वार से भी गंगाजल लेकर आस्थालु अपने गन्तव्य की ओर बढ़ते हैँ।
प्रतिवर्ष बड़ी संख्या मे लोग काँवर-यात्रा करते हैँ। आँकड़े बोलते हैँ कि उत्तरप्रदेश मे वर्ष २०२२ मे लगभग ३ करोड़ ८ लाख, वर्ष २०२३ मे लगभग ३ करोड़ और वर्ष २०२४ मे ४ करोड़ ८० लाख लोग काँवर-यात्रा मे सम्मिलित हुए थे। इस वर्ष लगभग ५ करोड़ लोग उक्त यात्रा मे शामिल होँगे, ऐसी उत्तरप्रदेश-शासन की ओर से बताया गया है।
अब यहाँ एक गम्भीर प्रश्न है, जब उत्तरप्रदेश-शासन ५ करोड़ काँवर-यात्रियोँ के सम्मिलित होने के लिए बात कर रही है तब उसके लिए ऐसी कौन-सी व्यवस्था की गयी है, जिससे कि प्रतिदिन काँवरिये राह चलते लोग को मारते आ रहे हैँ; उनके वाहन तोड़ रहे हैँ और जनसामान्य के बीच आतंक फैला रहे हैँ। उनके अवैध कृत्योँ से जनसामान्य को बचाने के लिए उत्तरप्रदेश-शासन की ओर से कौन-सी व्यवस्था की गयी है? उत्तरप्रदेश-शासन की ओर से उन काँवरियोँ के लिए कोई दिशानिर्देश प्रसारित किया गया है? यदि हाँ तो क्या वे उसका पालन कर रहे हैँ और नहीँ तो क्योँ?
सच तो यह है कि धर्म, हिन्दू, भगवा, सनातन आदिक की खेती कर रही सरकार पूरी तरह से दोषी है, जिसने तथाकथित ‘काँवड़ियोँ’ को मनचाहा करने का ठीका दे दिया है, वरना पवित्रतापूर्ण यात्रा मे काँवरिये की वेश-भूषा मे दिख रहे अराजक तत्त्व सम्पूर्ण वातावरण को हिँस्र और विध्वंसक नहीँ बनाते। काँवरियोँ का एक वर्ग ऐसा है, जो बेहिचक मौत का सामान लेकर चले जा रहे हैँ और चले आ रहे हैँ। उनके वाहन के चारोँ ओर इतने ख़तरनाक डी० जे०-उपकरण लगाये गये हैँ, जो आस-पास की बस्तियोँ मे रहनेवाले लोग की रात-दिन की नीँद उड़ाते आ रहे हैँ और जाने-अनजाने काँवरियोँ को बहरा बनाने का काम भी आसानी से करते आ रहे हैँ; जो विद्यार्थी अध्ययनरत हैँ, उन्हेँ भी व्यवधान पहुँचा रहे हैँ, जबकि सरकार पूरी तरह से मौन रहकर उन्हेँ मनबढ़ बना रही है। काँवरिये अपने पाप धोने और पुण्य कमाने के लिए गंगाजल लेकर समीपतम शिवालयोँ मे जा रहे हैँ; परन्तु रास्तेभर उनके जिस तरह के कुकृत्य प्रकाशित-प्रचारित हो रहे हैँ, उससे उनका दुष्कृत्य ‘महापाप’ की श्रेणी मे आता है। चकाचौँध रौशनी से भरपूर काँवरियोँ का वाहन किसी की भी आँखोँ को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
जो काँवरिये ‘काँवरयात्रा’ के खण्डित होने की आड़ मे प्रतिदिन सड़क-मार्ग पर आतंक फैलाते आ रहे हैँ, उन सबको जान लेना चाहिए कि यदि गंगाजल ले जाते समय किसी काँवरिये का एक बूँद भी गंगाजल छलककर धरती पर गिरता है तो तो उसकी यात्रा खण्डित हो जाती है। ऐसी स्थिति मे, उसे अपनी यात्रा फिर से करनी पड़ती है। इसके लिए घोर हिन्दूवादी सरकार ने उनके लिए नये काँवर और गंगाजल की व्यवस्था करायी है; उनके लिए विश्रामकेन्द्र आदिक की व्यवस्था करायी है, जिसके पीछे मात्र ‘सत्ता की राजनीति’ है; क्योँकि सरकार जानती है कि बहुसंख्य काँवरिये दलित-समुदाय और पिछड़े-वर्ग से आते हैँ।
काँवरिये अपनी करनी के कारण मरते आ रहे हैँ। प्रतिवर्ष सड़कोँ पर लगे खम्भोँ से जुड़े बिजली के जीवित तार काँवरियोँ की इहलीला दर्दनाक तरीक़े से समाप्त करते आ रहे हैँ, जिन्हेँ हम कई दशक से देखते आ रहे हैँ; मगर बेशर्म
आँखेँ हैँ कि खुलती ही नहीँ।
काँवरियोँ के वाहनो की ऊँचाई देखिए; सतह से काफ़ी ऊँचे हाइ टेंशन तार की ऊँचाई से भी अधिक ऊँचा उनका सुसज्जित वाहन होता है, जो कहीँ ऊँचे-नीचे जानलेवा तारोँ के साथ होड़ करता दिख रहा होता है। उन पर किस तरह से काँवरिये सीना तानकर चढ़ते हुए, मौत को निमन्त्रित करते आ रहे हैँ, मानो वे दिग्विजय-यात्रा के लिए प्रस्थान कर रहे होँ। दु:ख है और आश्चर्य भी! उनके माँ-बाप और अन्य बड़े-बुज़ुर्ग आँखसहित ‘अन्धे’ दिखते आ रहे हैँ और मरने पर ‘विधवा-विलाप’ करते।
हमने पिछले वर्ष देखा था कि सहारनपुर मे हाइ टेंशन तारोँ से झुलसकर ५, मेरठ मे ६, हरदोई मे १ तथा देवघर मे १ (महिला) काँवरिये की जीवनलीला समाप्त हो गयी थी।
इस वर्ष की काँवरयात्रा की अवधि मे उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड मे कई काँवरिये बिजली की तार की चपेट मे आकर मर चुके हैँ और कई बुरी तरह से झुलसकर जीवन-मौत के बीच जूझ रहे हैँ; सड़क-दुर्घटना मे मर चुके हैँ; मार-काट मे मरे और बुरी तरह से घायल हो चुके हैँ। इतना ही नहीँ, ग़लत तरीक़े से सड़क को छेँककर समूह मे चलने के कारण वाहनो की चपेट मे आकर बड़ी संख्या मे काँवरिये अपने जीवन से हाथ धो चुके हैँ।
उत्तरप्रदेश-सरकार की व्यवस्था पर विश्वास किया जाये तो मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ काँवर-यात्रा पर नज़र बनाये हुए हैँ। संवेदनशील जिलोँ मेरठ-परिक्षेत्र के चार जिलोँ मे १५ हज़ार पुलिसकर्मी तैनात किये गये हैँ, जबकि मेरठ, बुलन्दशहर, बागपत और हापुड़ मे ५७ मण्डल और १५५ क्षेत्र बनाने की बातकर सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात की गयी है, जिसके लिए ५,००० कैमरोँ से गतिविधियोँ पर नज़र रखने की भी बात की गयी है। ग़ाज़ियाबाद के समस्त काँवरयात्रा-मार्ग पर ७०० यातायात-पुलिसकर्मी तैनात किये गये हैँ, ऐसी भी सूचना है। इतना ही नहीँ, काँवरयात्रा की अवधि मे पुलिसकर्मियोँ को जो अतिरिक्त व्यवस्था सौँपी गयी है, वह चिन्तनीय है। काँवरियोँ की सुरक्षा करना, काँवरियोँ के बीच मे शामिल अराजक तत्त्वोँ की पहचान करना, काँवरियोँ के यात्रामार्ग पर नज़र बनाये रखना, यातायात-प्रबन्धन को नियन्त्रित करना और काँवरियोँ का मार्ग बदलना– ये सारे दायित्व सम्बन्धित पुलिसकर्मियोँ को सौँपे गये हैँ, जो एक प्रकार से पुलिसकर्मियोँ की शक्ति, समय और सामर्थ्य का दुरुपयोग है।
यदि इतनी सुचारु और समुचित व्यवस्था है तो काँवरधारी मनचाहे ढंग से आतंक क्योँ फैलाते आ रहे हैँ? काँवरियोँ ने मीरज़ापुर रेल-स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर एक सैनिक को बुरी तरह से क्योँ पीटा? मद्यपदार्थ का सेवन और व्यभिचार करते हुए क्योँ और कैसे पकड़े जा रहे हैँ? उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड की सरकारोँ के पास इनका उत्तर है?
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