रामभक्ति देखिए, कुर्सी से अब सटने लगे!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भाषाविद् डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बातों-ही-बातों में, ‘आदर्श’ अब बँटने लगे,
जनाब को देखिए, मुद्दों से अब हटने लगे!
राम तो राजसिंहासन, त्याग कर आगे बढ़े,
ग़ज़ब की रामभक्ति, कुर्सी से अब सटने लगे!
आश्वासनबाबू की बाबूगिरी के क्या कहने हैं,
जन-जन की नज़रों में, क़द अब घटने लगे।
बेहयाई, बेशर्मी का आलम न पूछिए हुज़ूर!
‘हर सू हम-ही-हम रहें’, मन्त्र अब जपने लगे।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, मुँह बाये है खड़ा,
बेटियाँ कहाँ महफ़ूज़, माँ-बाप अब डरने लगे।
‘विकास’ की कहानी यहाँ ‘वेंटिलेटर’ पे है लेटी,
दग़ाबाज़ चेहरों के यहाँ कर्म हैं अब सड़ने लगे।
बूढ़ा बहत्तर साल का बहुत सहमा दिख रहा,
‘न्यू इण्डिया’ थोपने की, रियाज़ अब करने लगे।
वर्षों से अदालत के कठघरे में राम हैं उनके,
रामभूमि बिसर गये, ‘आरक्षण’ अब रटने लगे!
अनाचारी, अत्याचारी, कदाचारी हर मोड़ पे,
पाठ ‘रामराज’ का, बेईमान हैं अब रटने लगे।
महँगाई की आग में, जनता झोंकी जा रही,
क्रोध में, आक्रोश में, लोग अब फटने लगे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ जुलाई, २०१९ ईसवी)