
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डे-
इस मुक्त मीडिया के माध्यम से उन उदित-नवोदित, विकसित-विकासमान् हस्ताक्षरों की सर्जन प्रातिभ सामर्थ्य से जब साक्षात् करता हूँ, जो प्रकारान्तर से मेरे शिष्य रहे हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है, मानो ‘गुरु-शिष्य-परम्परा’ अभी विच्छिन्न नहीं हुई है; उसके मूल में ‘सत्यांश’ अब भी एक ऐसे गौरवपूर्ण दीप के रूप में टिमटिमाता हुआ संलक्षित हो रहा है, जो भावी प्रकाश-स्तम्भ का आकार शनै:-शनै: ग्रहण करने-हेतु आतुर है; व्यग्र है तथा उत्सुक भी।
सम्भावनाओं से सम्पूर्ण ऐसे भास्वर और कान्तिमय परिवेश पर दृष्टिपात करते ही दसों दिशाएँ मन्त्रमुग्ध हैं। जीवन का ऐसा कोई सम्भाग नहीं, जहाँ मेरे अनुशासित, मर्यादित तथा संयमित शिष्य अपना साधिकार हस्तक्षेप करने में समर्थ न हो रहे हों। कठिनाई यह है कि उन्हें उनकी अर्हता के अनुरूप और अभिरुचि के अनुकूल दायित्व-निर्वहन करने के लिए अवसर नहीं दिया जाता।
प्रकृति, भाषा, शिक्षा, अध्यात्म, संस्कृति, कला, स्वास्थ्य, समाज, साहित्य, विज्ञान, पर्यावरण, मीडिया, चिकित्सा, प्रशासन, व्यवसाय आदिक क्षेत्रों में श्लाघ्य अवदान कर रहे, मेरे शिष्य तुलना और मूल्यांकन-स्तर पर ‘बीस’ हैं, ‘उन्नीस’ नहीं।
सत्य तो यह है कि नितान्त अयोग्यता के बाद भी ‘इधर-उधर मुँह मारकर’, ‘अपने पद का दुरुपयोग कर’ तथा ‘रूप, रुपया-रुतबा के आधार पर’ जो जन विविध क्षेत्रों में ‘अग्रसर’ के रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन सबकी उपलब्धियाँ मात्र ‘बुद्बुद-सदृश’ क्षणभंगुर हैं। ऐसे लोग परजीवी-कोटि के अन्तर्गत रेखांकित होते हैं।
ऐसे परमुखापेक्षी जीव अप्रतिहत जिजीविषा और जिगीषा से सम्पृक्त मेरे शिष्यमण्डल की आभा के सम्मुख निष्प्रभ लक्षित हो रहे हैं।
मैं अपने समस्त शिष्यवृन्द के समुज्ज्वल और भास्वर भविष्य की कामना करता हूँ।