जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज)
हे राम!
अयोध्या तुम्हें बुलाती है;
राह में दीये जलाती है।
हे राम!………….
तुम्हीं हो मेरे आठों याम;
तुम्हीं से रघुवर ये सुखधाम।
तुम्हीं से मुरली की है तान;
तुम्हीं से जीवन का कल्याण।
अयोध्या खुशी मनाती है;
राह में दीये जलाती है।
हे राम!………….
तुम्हीं से मानव-धर्म महान;
तुम्हीं से मर्यादा बलवान।
तुम्हीं से अक्षुण्ण रघुकुल-रीति;
जगत् में न्यस्त नहीं अपकीर्ति।
दुःखों का भार ढहाती है;
राह में दीये जलाती है।
हे राम!………….
तुम्हीं से निर्मल सरयू- नीर;
तुम्हीं से मिटती मन की पीर।
तुम्हीं से है जग का उद्धार;
तुम्हीं से शोभा है सरकार।
चरण में शीश नँवाती है;
राह में दीये जलाती है।
हे राम!………….