—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक : कर्म– पश्चात्ताप करने का अवसर नहीं देता।
दो : दर्पण– असत्य सम्भाषण करने से रक्षा करता है।
तीन : ज्ञान– आशंकित होने से बचाता है।
चार : अध्यात्म– मोह-पाश में आबद्ध होने से बचाता है।
पाँच : सत्य– अशक्त (दुर्बल) होने से रक्षा करता है।
छ: प्रेम– ईर्ष्या, द्वेष, मात्सर्य, द्वेषादिक विकृतियों को नष्ट करता है।
सात : विश्वास– नैराश्य, अवसाद तथा अन्य नकारात्मक स्थितियों से बचाता है।
तो आइए! आप मेरे इस अनन्य मित्रमण्डल से हाथ मिलाइए और निरापद (सुरक्षित) जीवन-यापन कीजिए।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ सितम्बर, २०२० ईसवी)