एगो भोजपुरी ह
० आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
जे-जे रहे दोस्त, सभ दुसमन होइ गइले,
हमारा रहतिया में, सभ काँटा बोइ गइले।
खूबे हँसी आवेला, ‘बाबू’ के चल्हकिया पर;
जे सुरुज के गोलवा, चनरमा समुझि गइले।
डूबत खूब देख ले, सुरूज माहाराज के उ;
हमारा खातिर उ त, अब गरहन होइ गइले।
”तहरा खातिर हम रात-दिन एक करब हो;”
कहनिया भूली के मझधारि में छोड़ि गइले।
काहें के अझुरावतार, भरोसवा के जलिया में;
कहाँ बा बिसवास, सब केहू त ठगि गइले?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ नवम्बर, २०२० ईसवी।)