लिखने से ना काम चलेगा, अब सड़कों पर आना होगा

योगेश समदर्शी ( हास्य एवं ओज कवि)-


लिखने से ना काम चलेगा, अब सडको पर आना होगा ।
मात भारती के गीतों को, घर घर जा कर गान होगा ।
सेना का अपमान देख कर, भी जो खून नहीं खौला ।
पानी है वो खूंन नहीं है, बर्फीला ठंडा गोला ।
घाटी में सेना पर उठ कर हाथ सलामत है कैसे ?
गददारों की खेप कौम और जात सलामत है कैसे ?
दिल्ली की गद्दी भी इस पर अब तक बोल नहीं पाई  ।
और फ़ौज के बंधे हाथ भी अब तक खौल नहीं पाई ।
सैनिक चुप थप्पड़ खाता था इसका कारण कौन रहा ।
सत्ता के कारण ही सैनिक चांटा खा कर मौन रहा ।
सैनिक को आदेश जो होते कुर्सी ओहदेदारों के  ।
पल में होश ठिकाने होते, घाटी में गद्दारों के ।
तोप तमंचे सब सेना के बना खिलोने छोड़ दिए ।
समझौतों के घातक निर्णय सेनाओं से जोड़ दिए ।
पत्थर जो सेना पर फेंके क्या बोलो गद्दार नहीं  ।
लातों के भूतों का बातों से होता उद्धार नहीं ।
जरा बात पर कैंडल ले कर जो सड़को पर आते हैं ।
सेना की तौहीन पे देखो वो भी चुप रह जाते हैं ।
लेकिन असली खून रगों में हिन्दुस्तानी खोलेगा ।
घर में चुप न बैठेगा अब आ सड़कों पर बोलेगा ।
सैनिक घर में थप्पड़ खाये हम घूमे उद्द्यानों में ।
सेना के सम्मान में सबको आना है मैदानों में ।
शनिवार की शाम मिलेंगे हम सब इण्डिया गेट पर ।
लाल किले तक साथ चलेंगे हो न जाना लेट पर ।
सेना के अपमान पे चुप्पी ठीक नहीं है घातक है ।
जो सीमा पे खून बहाते वो भारत के जातक है ।
जात पात व धर्म से ऊपर सैनिक का बलिदान रहा ।
जब सेना ने करी हिफाजत तब ही हिन्दुस्तान रहा ।
जितने लेखक मित्र कवि जो आग उगलते रहते हैं ।
वो सब तो पक्का आना जो देश प्रेम ही कहते हैं ।
मुझे यकीन है देश प्रेम से भरे हुए सब आएँगे ।
और देश की बहरी कुर्सी को ताकत दिखलाएंगे ।
सेना का अपमान देश में सहा नहीं अब जाएगा ।
ऐसी तख्ती लिख कर बच्चा बच्चा उस दिन आएगा ।
जय जवान और जय किसान का नारा फिर दोहराना है ।
फिर कहता हूँ देश प्रेम से भर कर दिल्ली आना है ॥