मनुष्य यदि आत्मानुशासित नहीं है तो उसे ‘आत्मचिन्तन’ का आश्रय लेना होता है, अन्यथा वह एक ‘रिक्त पात्र’ की तरह से ‘सार्वकालिक वस्तु’ बनकर रह जाता है। अनुशासन का चरित्र वैषम्य (विषमता) से परे का विषय होता है, इसलिए उसका निर्देशन सर्वोपरि होता है; उसे खण्डित करनेवाला अपनी ‘थोथी’ सफलता पर आत्ममुग्ध तो हो सकता है; परन्तु “आँखों में आँखें डालकर” (साहस के साथ; पारदर्शी बनकर) संवाद करने की स्थिति में स्वयं को नहीं पा सकता।
मनुष्य जितना होता है, उतना ही यदि दिखे तो आँखों को भाता है। उसका सामर्थ्यहीन ‘अतिरिक्त’ प्रयास और ‘ताकझाँक’ उसे प्रथम श्रेणी के अनुकृतिकार ‘नक़्लची’ (‘नक़लची’ अशुद्ध शब्द है।) के रूप में विस्थापित करते हैं। ऐसे ही लोग ”गिरगिट-चरित्र” (अविश्वसनीय) को जीते हैं, जो समाज के लिए नितान्त (पूर्णत:, बिलकुल) भयावह हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)