कितना खामोश होता है ठहरा हुआ पानी

कितना खामोश होता है ठहरा हुआ पानी ,

बिल्कुल ज़िंदगी की तरह शांत।

लहरे पानी में भी उठती हैं,

जिंदगी में भी ।

कुछ किनारे इनके थपेड़ो से टूट जाते हैं ,

फ़ना हो जाते हैं एक दूसरे में एच2ओ की तरह।

किनारों पर अनवरत थपेड़े सह कर कुछ चट्टान दृढ़ रहते हैं ,

बिल्कुल कभी न हार मानने वाले किसान की तरह ।

ठंडी ,गर्मी धूप, छांव, भूख और बीमारी में भी टिके रहते हैं ,
क्रांतिकारी ,हक की लड़ाई लड़ते किसानों ,

शाहीन बागके आंदोलनकरी ,

जंगल बचाते आदिवासियों और तमाम उन देश के जागृत नागरिकों की तरह ,

जो अनवरत कुर्बान होते रहते हैं ,

अपनी आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा के लिए ,

उनकी आज़ादी के लिए ,

जो भूल जाते हैं अपना,

सब कुछ

सब कुछ

और मिट जाते हैं थपेड़े सहते हुए तिल तिल मिटते चट्टान की तरह ,

फिर भी एक नया किनारा छोड़ जाते हैं

आने वाली लहरों के नये थपेडों के लिए ।

कवि गोंड
इलाहाबाद विश्वविद्यालय