कविता : युवक

शिवाजी पटेल, कुरसठ

जन्म लेकर जैसे ही इस दुनिया में आता है।
माँ-बाप का वह राजा बेटा कहलाता है।
दिन पर दिन वह प्यार से बड़ा होता जाता है।
बाप के कंधे पर हर जगह घूम के आता है।
माँ के प्यार भरे हाथों से वह भोजन भी खाता है।
यही समय उसके हर समय से प्यारा होता है।
इस समय सबका राजदुलारा होता है।
बाल्यावस्था को छोड़ जब किशोर बन जाता है।
दुनिया की हर बात का ज्ञान उसे हो जाता है।
इस समाज में वह अपने गुणों से जाना जाता है।
शिक्षा ग्रहण करके वह योग्य बन जाता है।
कॉलेज की शिक्षा पूर्ण कर वह बाहर पढ़ने जाता है।
मकान बनाने के लिए वह घर छोड़कर जाता है।
माँ-बाप को छोड़ना बड़ा ही भारी लगता है।
उनके बिना जीना भी गद्दारी लगने लगता है।
चार बार खाना पूछना माँ की याद बहुत दिलाता है।
जबकि बाहर बेटा मुश्किल से खा पाता है।
रात में जब अकेलापन बिस्तर पर हम को खाता है।
बचपन की लोरी सुन कर सोना याद बहुत आता है।                                      होली दिवाली रक्षाबंधन दो दिन को जब घर आता है।
दो दिन का है टूर बस इस बात से दिल घबराता है।
धीरे-धीरे ऐसे करके सारी आजादी छिन जाती है।
जब बाप के बाद बेटे पर जिम्मेदारी आ जाती है।             जिम्मेदारी के बोझ तले ऐसे ही रह जाता है।
उसी युवक का जीवन फिर ऐसे ही कट जाता है।
शिवाजी पटेल