मैं एक गधा आवारा हूँ

सब यही सुना कर कहते हैं,
मैं एक गधा आवारा हूँ।
मानवता जिनमें होती है,
बस उसी प्यार का मारा हूँ।।

सबकी अपनी दुनिया होती,
मैं भी अपने में जीता हूँ।
ढोता हूँ जग का भार,
और कटुताओं को चुप पीता हूँ।।

सबकी सब बातें सुनता हूँ,
पर अपने मन की करता हूँ।
डरना कैसा,जब बंधा मूर्ख का ताज,
‘बैल का बाप’ सोच चुप रहता हूँ।।

सारे मालिक निर्दयी मिले,
बस कार्य शक्ति को परखा है।
फूटे कूबड़, टूटें टाँगें,
इससे कब मतलब रक्खा है?

मैं उनसे कम मतलबी नहीं ।
जब दाना-चारा की ताब नहीं ।
तो कैसा मालिक, किसकी सेवा,
रहती बस मन में बात यही ?

यह बात सभी जन कहते हैं,
जब काम नहीं तो दाम नहीं।
प्यारा होता है काम,
प्यारा होता है चाम नहीं।।

मैं भी तो यही दोहराता हूँ,
बेमन भी चलता जाता हूँ।
छुट्टी के दिन खड़े-खड़े,
कूबड़ का घाव सुखाता हूँ।।

कूबड़ से गहरे घाव ह्रदय में,
कैसे भला सुखाऊँ मैं ?
बेरहम सभ्य दुनिया वाले,
मरहम, कितना भी खाऊँ मैं।।

भगवान, तुझे सद्बुद्धि मिले,
तू मुझसे कम है मूर्ख नहीं।
सुख-दुःख में डाला दुनिया को,
पर मुझ पर कोई फर्क नहीं।।

सब कहते हैं, तो यही सही,
हारा मारा बेचारा हूँ।
पर इतना तो सच है, भाई,
मैं नहीं गधा आवारा हूँ।।

बस मूर्ख गधा बेचारा हूँ।।
मैं एक गधा आवारा हूँ।।

रचना काल, जनवरी 1999
अवधेश कुमार शुक्ला
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