- रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया/आमवातीय संधिशोथ) पर अपनी तरह के पहले तीसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल शुरू
- सीसीआरएस और एवीपी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से संयुक्त रूप से किया जा रहा है ट्रायल
नई दिल्ली, 23 मार्च। आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग गठिया (रूमेटाइड अर्थराइटिस यानी आमवातीय संधिशोथ) की समस्या से पीड़ित हैं। इसमें जोड़ों में सूजन, असहनीय दर्द, चलने और उठने में सहारे की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी तो रोगी दिव्यांग भी हो जाता है। इस समस्या से आयुर्वेदिक पद्धति से निजात पाने के लिए तीसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर दिया गया है, जो दो साल तक चलेगा। यह क्लीनिकल ट्रायल के सर्वोत्तम मापदंडों पर आधारित तीसरे चरण का बहुकेंद्रीय क्लीनिकल ट्रायल है। अध्ययन केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के सहयोग से एवीपी रिसर्च फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए सीसीआरएएस और एवीपी रिसर्च फाउंडेशन के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी कर लिए गए हैं।
विश्व के मशहूर रुमेटोलॉजिस्ट द्वारा किया गया ट्रायल डिजाइन
यह तीसरे चरण का बहुकेंद्रीय ट्रायल विश्व प्रसिद्ध रुमेटोलॉजिस्ट डॉ. डैनियल फुर्स्ट द्वारा डिजाइन किया गया है, जो वर्तमान में आर्थराइटिस एसोसिएशन ऑफ साउथ कैलिफोर्निया (एएएससी) में नैदानिक अनुसंधान के निदेशक भी हैं। वह ट्रायल का मार्गदर्शन भी कर रहे हैं। एवीपी रिसर्च फाउंडेशन के तहत कोयंबटूर एवीपी अस्पताल के अलावा क्षेत्रीय आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर मेटाबोलिक डिसऑर्डर, बेंगलुरु और राजा रामदेव आनंदीला सेंट्रल आयुर्वेद रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर मुंबई भी इस ट्रायल में शामिल हैं। इसमें एवीपी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक डॉ. सोमित कुमार सह-अन्वेषक की भूमिका निभा रहे हैं।
डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशन में हो रहा है ट्रायल
एवीपी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक व ट्रायल के सह-अन्वेषक डॉ. सोमित कुमार ने बताया कि मार्च 2022 में शुरू हुआ अध्ययन दो साल तक चलेगा। ट्रायल में 1 मई से करीब 9 महीने तक मरीजों की निगरानी की जाएगी क्योंकि रोग गतिविधि में बदलाव में करीब 9 महीने का समय लगता है। अध्ययन प्लेसबो नियंत्रण विधि द्वारा किया जाएगा, जिसमें बाहरी मॉनिटर शामिल हैं। इसे डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों और मानदंडों के अनुसार किया जा रहा है। केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान के मेटाबोलिक डिसऑर्डर विभाग के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एमएन शुभश्री ने बताया कि सैंपल साइज पायलट स्टडी से लगभग 5 गुना बड़ा है। पहले जहां 48 मरीज पर अध्ययन हुआ था, वहीं इस बार 240 मरीजों पर किया जा रहा है। यह तीसरे चरण का ट्रायल है जो पूर्व के अध्ययन को मान्य करेगा। ट्रायल अध्ययन के सदस्य डॉ. डेनियल फ़र्स्ट, डॉ. पी. राम मनोहर, पूर्व पायलट अध्ययन के पीआई, डॉ. नंदिनी के. कुमार (नैतिकता विशेषज्ञ), डॉ. अनीता महापात्रा, डॉ. रेशमी पुष्पन और डॉ. मनोरमा वेंकटरमन, पूर्व पायलट होंगे। एवीपी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और इस अध्ययन के सह-अन्वेषक डॉ. सोमित कुमार ने कहा कि जांचकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन इंटीग्रेटिव मेडिसिन रिसर्च भी मिला
यह ट्रायल 2003 में एवीपी द्वारा किए गए पहले पायलट ट्रायल का अनुवर्ती है। वर्ष 2003 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, यूएसए ने वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सिएटल के माध्यम से इसका प्रभाव और क्षमता परखने के लिए ट्रायल को अनुदान दिया था। ट्रायल आयुर्वेदिक उपचार और मानक एलोपैथिक उपचार को लेकर किया गया था। इस ट्रायल का परिणाम एनल्स ऑफ रयूमेटिक डिजीज और जर्नल ऑफ क्लिनिकल रयूमेटोलॉजी जैसी प्रमुख शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। सीएएम के एक आलोचक डॉ. एडज़ार्ड अर्न्स्ट द्वारा पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा (सीएएम) पर भविष्य के अध्ययन के लिए एक खाका के रूप में ट्रायल की भी सिफारिश की गई थी। जेसीआर में प्रकाशित पेपर ने प्रतिष्ठित यूरोपियन सोसाइटी ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन का “अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन इंटीग्रेटिव मेडिसिन रिसर्च” भी जीता है। यूरोप में आयुर्वेद को मान्यता देने की दिशा में यह एक बड़ा कदम था।
क्या है रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया/आमवातीय संधिशोथ)
रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया/आमवातीय संधिशोथ) बीमारी तब होती है जब प्रतिरक्षा प्रणाली साइनोवियम पर हमला करती है। साइनोवियम जोड़ों के चारों ओर झिल्ली की एक परत होती है। साइनोवियम में सूजन आदि होने के कारण अंत में कार्टिलेज व जोड़ों के बीच की हड्डी नष्ट हो जाती है। कार्टिलेज दो हड्डियों को जोड़ने वाले मजबूत तथा लचीले ऊतक होते हैं। जोड़ों को एक साथ थाम कर रखने वाले टेंडन्स और लिगामेंट्स में खिंचाव आज जाता है और वे कमजोर पड़ जाते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे जोड़ अपना आकार और अलाइनमेंट खो देते हैं।
यह हैं रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया/आमवातीय संधिशोथ) के लक्षण
रूमेटाइड अर्थराइटिस (गठिया/आमवातीय संधिशोथ) एक ऐसी बीमारी है जो जोड़ों में दर्द, सूजन और जकड़न का कारण बनती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह एक ऑटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर की इम्यूनिटी स्वस्थ कोशिकाओं को ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है यानी ऐसा रोगा जिसमें शरीर का प्रतिरोधक तंत्र ही स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगता है।
यह है प्लेसबो नियंत्रण विधि
कूटभेषज के उपयोग से कभी-कभी लाभ होता दिखता है जिसे ‘कूटभेषज प्रभाव’ (प्लेसीबो इफेक्ट) या कूटभेषज अनुक्रिया’ (प्लेसीबो रिस्पॉन्स) कहते हैं।