दृष्टिबोध और दृष्टिकोण

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरे समीप कुछ लोग बैठे हुए थे, तभी एक विचार कौंधा (मस्तिष्क/दिमाग़ मे कौंधा, अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रयोग है; क्योंकि विचार ‘मस्तिष्क’/’दिमाग़’ मे ही कौंधता है।)। मेरे सामने दो गिलास थे; दोनो (‘दोनों’ अशुद्ध है।) ही रिक्त थे। मैने (‘मैंने’ अशुद्ध है।) एक गिलास उठाया और उसमे जल भर दिया, फिर उस भरे गिलास मे से आधा जल गिरा दिया। वह गिलास जल से आधा भरा हुआ था। (वह गिलास आधा जल से भरा हुआ था।– यह वाक्य अशुद्ध है।)

मैने उस गिलास को उठा लिया और उसे दिखाते हुए, वहाँ बैठे हुए एक व्यक्ति से प्रश्न किया, “यह क्या है?” उस गिलास को देखकर पहले व्यक्ति ने कहा– गिलास आधा भरा है। मैं उसी गिलास को लेकर एक-दूसरे व्यक्ति के समीप आया (यहाँ ‘गया’ अशुद्ध है; क्योंकि किसी के ‘समीप’ आया जाता है, ‘जाया’ नहीं जाता।) और उससे भी यही प्रश्न किया। उस दूसरे व्यक्ति का उत्तर थोड़ा हटकर था। उसने बताया– गिलास आधा ख़ाली है।
दोनों के उत्तर उपयुक्त हैं; देखने की शैली भिन्न-भिन्न है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ मार्च, २०२२ ईसवी।)