जागर्ति और सुषुप्ति

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज के सघन पदातिक पथ पर
विश्रान्त-क्लान्त शयन करती प्रौढ़ा,
आजीविका-साधन से समन्वय-सामंजस्य स्थापित करती;
अद्भुत एकान्वित और पार्थक्य के
आचरण की सभ्यता प्रदर्शित करती;
अवचेतन से साक्षात् करती,
मानो सांसारिकता से सुदूर
किसी निभृत निलय में विराजित स्वप्न-सुन्दरी
श्रेय-प्रेय, योग-क्षेम के बाहुपाश में निबद्ध अपनी स्मिति से
स्वप्नलोक के खण्डित-अखण्डित,
आकर्षण-विकर्षण, आवर्त्तन और दरार को
आभूषित कर रही हो।
अभी, सहसा चेतना के धरातल पर पग धरते ही
विचार-उष्मा प्रकट होगी,
मन स्वयं से प्रश्न करेगा।
कदाचित् हथेलियों की लकीरों में प्रश्न अन्तर्निहित हो।
जागर्ति सुषुप्ति से प्रश्न करती है– तुम मुझसे सुदूर क्यों थी?
आँखों का उपहास करते आजीविका-साधन
अपने अट्टहास को प्रकीर्ण करते
प्रौढ़ा को निराशा-ग्रन्थि से आबद्ध करते।
दु:-सुस्वप्न को टटोलती वह नायिका,
मानो मुट्ठी से सरकती रेत को ‘मृग-मरीचिका’-सदृश
साक्षी दे रही हो।
और दृष्टि-अनुलेपन कर रही हो,
वर्ज्य दीवार के भीतर प्रेक्षित
अप्रत्याशित-कल्पनातीत दृश्य को।
नासिकारन्ध्र उन्मुक्त हों,
स्वप्न-गन्धि के घ्राणशक्ति-तन्तुओं को
स्वयं से आबद्ध करने को।


(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)