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आपमे यदि प्रतिभा है; योग्यता है तथा संसार को जीतने की इच्छा (जिगीषा) है तो आप कभी परमुखापेक्षी न बने। आपका परम धर्म है, ‘केवल कर्म करते रहना’। आपकी धारणा होनी चाहिए– अभिलषित वस्तु मिलेगी तो उचित, न मिलेगी तो भी उचित। आप उसे पाने के लिए ‘शीर्षासन’ करने से बचें।
कम-से-कम बोलें; अधिक सुने; बहुत तर्क न करें; इससे पहले कि तर्क ‘कुतर्क’ का रूप ले ले, आप वहाँ से हट जायें अथवा उस विषय से स्वयं को पृथक् कर लें। आप यदि उस विषय मे संलिप्त दिखेंगे तो ‘वैचारिक प्रदूषण’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
व्यक्ति को पहचानना सीखें। आपको यदि प्रतीत होता हो कि आप जिसके साथ संवाद कर रहे होते हैं, वह ऐसे ‘ग्रन्थि-विशेष’ से प्रभावित है, जिसका कोई सामाजिक मूल्य नहीं; किन्तु समाज के लिए घातक है तो आप उसे समय-सत्य विचार-प्रक्रिया के साथ जोड़ने का प्रयास करें, फिर भी उसकी दिशा लोकहितकारी न दिखे तो उससे सदैव के लिए सुदूर हो लें। आप यदि वैसा नहीं करते हैं तो आपकी ऊर्जा का क्षरण होता रहेगा और समय का अपव्यय भी।
आइए! ‘सत्यसंधान’ करें; ‘शब्दसंधान’ करें और अपनी बौद्धिक और वैचारिक प्रतिबद्धता को उत्तुंग शिखर पर प्रतिष्ठित करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)