राजनैतिक न्याय को परिभाषित करने वाली महालोकतंत्रीय स्वशासनप्रणाली :-
लोकतंत्र शब्द में दो शब्दों का संयोग है- लोक + तंत्र।
लोक मतलब सार्वजनिक और तंत्र मतलब शासन।
अर्थात “सार्वजनिक शासन” ही लोकतंत्र है।
शासन का परिचय
शासन का संपूर्ण संरचनात्मक ढांचा दो भागों में स्थित होता है-
शासनसत्ता और शासनव्यवस्था।
शासनसत्ता के 3 अंग होते हैं-
विधायिका, मंत्रिका, न्यायिका।
और शासनव्यवस्था के भी 3 अंग होते हैं-
विधान, मंत्रणा, न्याय।
और शासन के इन दोनों विभागों के तीनों अंगों के दो-दो विभाग होते हैं क्योंकि प्रत्येक अंग की नियुक्ति एवं निरस्ति अथवा पारित एवं खारिज करने की दो प्रक्रियाएँ होती हैं।
इस प्रकार से लोकतंत्र के कुल 12 विभाग सिद्ध होते हैं।
जन-मताधिकार
जन-मताधिकार ही लोकतंत्र का वास्तविक लक्षण है।
शासनसत्ता व शासनव्यवस्था के इन 12 अंगों का संचालन जनसहमति से किया जाना ही न्यायशील लोकतंत्र है।
अतः शासन के सभी 12 अंगों को न्यायोचित प्रतिष्ठित व संचालन करने हेतु सम्पूर्ण जनता (18+) द्वारा मताधिकार करवाना अनिवार्य है अन्यथा किसी भी राष्ट्र में सच्चा लोकतंत्र सिद्ध ही नहीं हो सकेगा।
वर्तमान लोकतंत्र
पूरी दुनिया के सभी लोकतांत्रिक राष्ट्रों में अभी तक कहीं भी न्यायशील लोकतंत्र लागू नहीं है।
अर्थात जनता को लोकतंत्र के नाम से धोखा देकर केवल राजतंत्र या वंशतंत्र या व्यक्तितन्त्र या दलतंत्र ही चल रहे हैं।
भारत में भी लोकतंत्र का केवल 1/12 भाग ही लागू है।
शेष 11 भाग अलोकतांत्रिक हैं, अर्थात शासन के 11 भागों में जनसहमति विलुप्त है, अर्थात जनता गुलाम है।
भारतीय संविधान की उद्देशिका में वर्णित “राजनैतिक न्याय” का आशय शासनसत्ता एवं शासनव्यवस्था में जनता की भागीदारी (जानने, समीक्षा करने, प्रस्ताव रखने एवं मतदान कर चुनने-हटाने व प्रस्तावों को पारित-ख़ारिज़ करने) का लोकतांत्रिक विशेषाधिकार से है अर्थात वोटिंग पॉवर के साथ वीटो पॉवर भी जनता के पास ही हो।
शासनसत्ता (विधायिका-मंत्रिका-न्यायिका)
1◆ नेता चुनना
2◆ नेता हटाना
3◆ मंत्री चुनना
4◆ मंत्री हटाना
5◆ जज चुनना
6◆ जज हटाना
शासनव्यवस्था (नियम-नीति-निर्णय)
1◆ नियम पारित करना
2◆ नियम खारिज करना
3◆ नीति पारित करना
4◆ नीति खारिज करना
5◆ निर्णय पारित करना
6◆ निर्णय खारिज करना
अभी तक जनता को 12 मताधिकारों में से सिर्फ “नेता चुनने” का 1 ही मताधिकार प्राप्त है।
बाकी 11 मताधिकार पिछले 75 वर्षीय लोकतंत्र से गायब हैं।
इन्हें प्रतिष्ठित किये बिना संविधान की उद्देशिका में वर्णित राजनैतिक न्याय की परिभाषा का उद्देश्य पूर्ण नही होगा।
न्यायशील महालोकतंत्र की प्रतिष्ठा-
शासन में जनता की भागेदारी को 12/12 सिद्ध होना ही न्यायशील लोकतंत्र है।
अतः भारतीय लोकतंत्र में जनता की भागीदारी को 1/12 से 12/12 भाग प्रतिष्ठित करना ही आपका राजनैतिक उद्देश्य बने।
यही वर्तमान भारतीय संविधान की उद्देशिका के प्रथमतः वर्णित राजनैतिक न्याय की सैद्धांतिक परिभाषा है।
महालोकतंत्र की महिमा
प्रश्न;
जबतक विवेकशील लोग बैठे रहेंगे, तबतक तो ठीक है लेकिन जब अयोग्य लोग शासनसत्ता व शासनव्यवस्था पर बैठ जाएंगे तब क्या होगा..?
किसी भी कारण से कभी-कभी अयोग्य लोग भी उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं, ऐसी दशा में उन अपात्र लोगों का नियंत्रण कैसे सम्भव होगा.?
उत्तर;
उन को नियंत्रित करने के लिए ही महालोकतंत्र की जरूरत है।
महालोकतंत्र सहज ही उनको नियंत्रित कर लेता है क्योंकि महालोकतंत्र में उन अयोग्य सत्ताधीशों द्वारा बनाए गए नियम-नीति-निर्णय सीधे-सीधे लागू नहीं होंगे बल्कि आम जनता द्वारा उन्हें पारित और खारिज किया जा सकेगा।
यही महालोकतंत्र की वास्तविक महिमा है।
प्रश्न;
जनता उपरोक्त सभी 12 वोटिंग व वीटो पॉवर का इस्तेमाल कैसे कर करेगी?
क्योंकि मौजूदा मतदान प्रक्रिया तो अति जटिल व खर्चीली है।
उत्तर;
बिल्कुल कर पायेगी जनता क्योंकि महालोकतंत्रीय स्वशासन प्रणाली लागू होते ही बैलेट मतदान व EVM की बजाय 100% आधार व वोटर ID नंबर लिंक्ड मोबाइल द्वारा मतदान प्रक्रिया को सम्पन्न करवाया जाएगा।
इस 100% डिजिटल वोटिंग कॉन्सेप्ट से सरकारी खजाने पर कोई अतिरिक्त भार नही आएगा और न ही मेन पावर की आवश्यकता होगी।
वोटिंग के दौरान ही चुनने व हटाने एवं पारित व ख़ारिज करने हेतु औसत मिनिमम 51% व औसत मध्यम 75% एवं औसत अधिकतम 95% जनता द्वारा की गई वोटिंग से सिद्ध हो जाएगा।
अर्थात वोटिंग के साथ-साथ ही रिजल्ट भी सार्वजनिक होगा।
✍ राम गुप्ता (स्वतंत्र पत्रकार)
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आमआदमीपार्टी, उत्तरप्रदेश