● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
अब भारतीय लोकतन्त्र एक ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। भारत की सरकार, जो कि एक व्यक्ति-विशेष की सरकार बनती दिखती आ रही है, जन-जन के भविष्य के लिए संकटमयी बना दी गयी है। जब प्रमुख विपक्षी दल के शीर्षस्थ नेता को जन-जन की आवाज़ बनने से बलपूर्वक रोक दिया जाये तब कल्पना कीजिए, हमारे लोकतन्त्र को बन्धक बनाकर, उसके साथ स्वेच्छाचारिता का कैसा और कितना बीभत्स व्यवहार किया जायेगा। इसके नमूने हम आये-दिन देखते भी आ रहे हैं।
ऐसी विकट और विस्फोटक स्थिति से देश की रक्षा करने के लिए एकमात्र उपाय दिखता है; और वह है, देश के समस्त विपक्षी दलों के सांसद सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दें। यदि ऐसा नहीं होता हो तो सबसे पहले सभी काँग्रेसी सांसद एकसाथ अपने पद का त्याग कर दें; अन्य विपक्षी दल के सांसद भी बाध्य और विवश हो जायेंगे। ऐसा होते ही भारत का संविधान ‘नीचे से ऊपर तक’ हिल जायेगा और सत्तापक्ष के गाल पर पड़नेवाले ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़’ के झन्नाटेदार तमाचे से भारतीय संसद् की नीवँ (‘नींव’ अशुद्ध है।) खलबला उठेगी; भारत की राजनीति मे एक अद्भुत-अकल्पनीय-अविश्वसनीय भूकम्प की ऐसी तीव्रता देखी जायेगी, जो ‘रिक्टर-पैमाने’ का अतिक्रमण करती दिखेगी। इतना ही नहीं, शेष विश्व विस्फारित नेत्रों से भारत के इस कलंकित राजनैतिक इतिहास को आँखें मीच-मीचकर देखता रह जायेगा।
विपक्षियों की ओर से यह निर्णायक पग उठाना, अब समय की आवश्यता बन चुका है, जो कि अनिवार्य है; अपरिहार्य है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ मार्च, २०२३ ईसवी।)