राघवेन्द्र कुमार राघव–
दुनिया के हर रिश्ते में तो
स्वार्थ कहीं छिप जाता है।
अपनेपन का हर एक दावा
प्रतिकूल समय पर ढह जाता है।
औलादों के अत्याचारों को
चुपचाप सहन कर जाती माँ।
रोती है कोने में लेकिन
मुख पर हँसी सजाती माँ।
खुद भूखी रह लेती लेकिन
बच्चों को भोजन देती है।
अपने हिस्से के सुख त्याग
उनकी झोली भर देती है।
खुद दर्दों से लड़ती रहती,
उफ तक न वो करती है।
लेकिन सन्तानों की खातिर
हर पल हँसती रहती है।
माँ का रिश्ता ऐसा ही है
जो सर्वश्रेष्ठ और महान है।
माँ कोई रिश्ता नहीं है
वो तो साक्षात भगवान है।
माँ मंदिर की पावन ज्योति,
माँ जीवन का स्पन्दन है।
माँ से ही घर घर होता है,
माँ का वन्दन अभिनन्दन है।
जिस घर में माँ का वास रहे
वो घर तीर्थ समान लगे।
माँ के चरणों की धूल सदा
हमको चारों धाम लगे।।