रामायण : स्थान सुख नहीं देता अपितु साथ सुख देता है

आर्य सुमन्त्र मौन थे। उनके पास शब्द थे, पर वे शब्द जैसे अपने अर्थ खो चुके थे। वे सीता के मुखमण्डल को देख रहे थे—वह मुख, जो राजमहलों की सुख-संपन्नता में पला था, किन्तु इस समय वन की धूलि में भी उसी प्रकार प्रसन्न और दृढ़ दिखाई दे रहा था। उनके हृदय में एक विचित्र द्वन्द्व चल रहा था। एक ओर महाराज दशरथ की आज्ञा थी, दूसरी ओर सीता की अटल निष्ठा।

उन्हें स्मरण आया कि जब महाराज ने उन्हें भेजा था, तब कितनी करुण दृष्टि से कहा था— सुमन्त्र! यदि राम न लौटें तो कम से कम जानकी को लौटा लाना। मैं पुत्र-वियोग सह सकता हूँ, पर उस सुकुमारी कन्या का वन में कष्ट सहना नहीं देख सकता। किन्तु आज सुमन्त्र देख रहे थे कि जिसे वे सुकुमारी समझ रहे थे, उसके भीतर हिमालय से भी अधिक दृढ़ता और समुद्र से भी अधिक गहराई विद्यमान थी।

सीता केवल जनकनन्दिनी नहीं थीं। वह प्रेम की परिभाषा थीं और प्रेम का स्वभाव ही यही है कि वह सुविधा का नहीं, समर्पण का मार्ग चुनता है।

कुछ देर तक मौन छाया रहा। वन की वायु मंद-मंद बह रही थी। दूर कहीं कोयल की ध्वनि सुनाई दे रही थी।

सुमन्त्र ने पुनः धीमे स्वर में कहा— देवि! आपका तर्क धर्ममय है, किन्तु वन का जीवन अत्यन्त कठोर है। यहाँ न राजभवन है, न सेविकाएँ, न सुख-सुविधाएँ। यहाँ तो केवल कष्ट ही कष्ट हैं। काँटे हैं, पथरीली भूमियाँ हैं, हिंसक पशु हैं। क्या आपने इन सबका विचार किया है?

सीता मुस्कराईं। सीता की वह मुस्कान करुण भी थी और दार्शनिक भी।

उन्होंने कहा— “तात! मनुष्य का दुःख वस्तुओं में नहीं होता, उसकी आसक्ति में होता है। जिसे सुख की आदत हो, उसके लिए सुख भी बन्धन बन जाता है और जिसे प्रेम का सहारा मिल जाए, उसके लिए दुःख भी साधना बन जाता है। सुमन्त्र ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

सीता आगे बोलीं— आप वन के काँटों की बात करते हैं। परन्तु क्या बिना राम के अयोध्या के फूल मुझे सुख दे सकते हैं? आप वन की निर्जनता का भय दिखाते हैं। परन्तु क्या राम-विहीन राजमहल मेरे लिए श्मशान से भिन्न होगा?

तात! स्थान सुख नहीं देता। साथ सुख देता है। भवन आनन्द नहीं देते। भाव आनन्द देता है।

सुमन्त्र की आँखें भर आईं। उन्हें लगा मानो वे किसी राजकुमारी से नहीं, किसी ऋषि से संवाद कर रहे हों।

उन्होंने पूछा— देवि! क्या आपको अपने माता-पिता की स्मृति नहीं आती? मिथिला का वैभव, बाल्यकाल की सखियाँ, माताश्री सुनयना का स्नेह—क्या यह सब आपको नहीं खींचता?

सीता ने आकाश की ओर देखा। उनकी आँखों में स्मृतियों का सागर लहरा उठा। कुछ क्षण वे मौन रहीं। फिर बोलीं— क्यों नहीं तात? मैं भी मनुष्य हूँ। मुझे भी माता की गोद याद आती है। मुझे भी मिथिला की गलियाँ स्मरण हैं। मुझे भी अपने बाल्यकाल के वे दिन याद आते हैं जब पिता के चरणों में बैठकर धर्म की बातें सुना करती थी। उनका स्वर भर्रा गया। किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने स्वयं को संयत कर लिया। परन्तु स्मृति और मोह में अन्तर होता है। स्मृति आत्मा को कोमल बनाती है। मोह आत्मा को बाँध देता है। मैं स्मृतियों का सम्मान करती हूँ, किन्तु उनके बन्धन में नहीं पड़ना चाहती।

वन के वृक्ष मानो इस संवाद को सुन रहे थे। पत्तों की सरसराहट किसी अदृश्य स्वीकृति की भाँति प्रतीत हो रही थी।

सीता ने पुनः कहा— तात! संसार में अधिकांश लोग प्रेम को प्राप्ति समझते हैं। किन्तु प्रेम प्राप्ति नहीं, त्याग है। जो प्रेम केवल सुख में साथ रहे, वह व्यापार है। जो दुःख में भी साथ रहे, वही प्रेम है।

यदि मैं आज अयोध्या लौट जाऊँ, तो संसार मुझे दोष न देगा। सब कहेंगे—राजकुमारी थी, वन का कष्ट नहीं सह सकी। पर मेरा अपना अन्तःकरण मुझे कभी क्षमा नहीं करेगा।

सुमन्त्र ने अनुभव किया कि सीता के शब्द केवल पति-भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं थे। उनमें जीवन-दर्शन का गहरा सत्य छिपा था।

मनुष्य जब किसी को अपने अस्तित्व का अंग मान लेता है, तब उसका वियोग स्वयं के वियोग के समान हो जाता है। यही कारण है कि सीता बार-बार छाया और शरीर का उदाहरण दे रही थीं।

छाया का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। वह शरीर के साथ ही रहती है। शरीर से पृथक होकर वह केवल अन्धकार में विलीन हो जाती है। सीता का प्रेम भी ऐसा ही था। उनके लिए राम कोई व्यक्ति मात्र नहीं थे। राम उनके अस्तित्त्व का केन्द्र थे।

इसी बीच श्रीराम समीप आकर खड़े हो गए। उन्होंने सुमन्त्र और सीता के संवाद का अधिकांश भाग सुन लिया था।

राम की आँखें भी सजल थीं। उन्होंने सुमन्त्र के कन्धे पर हाथ रखा और कहा— तात! अब लौट जाइए। सुमन्त्र कुछ कहना चाहते थे। पर शब्द गले में अटक गए। उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए। फूट-फूटकर रो पड़े।

आर्यपुत्र! मैं अयोध्या जाकर महाराज को क्या उत्तर दूँगा? राम ने गहरी साँस ली। उनसे कहना कि राम प्रसन्न हैं। उनसे कहना कि पुत्र ने पिता की आज्ञा को अपने जीवन का सौभाग्य माना है। उन्हें कहना कि उनके दिए संस्कार आज भी मेरे साथ हैं।

यह सुनकर सुमन्त्र का हृदय और भी व्यथित हो उठा। उन्हें ज्ञात था कि दशरथ का जीवन अब इस वियोग को सह नहीं सकेगा। किन्तु धर्म का मार्ग कभी-कभी इतना कठोर होता है कि उसमें करुणा भी विवश हो जाती है।

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। समय विदा का था। रथ तैयार खड़ा था। सुमन्त्र बार-बार पीछे मुड़कर देखते। राम, लक्ष्मण और सीता धीरे-धीरे वन की ओर बढ़ रहे थे। तीनों की आकृतियाँ दूर होती जा रही थीं। अन्ततः वे वृक्षों के झुरमुट में ओझल हो गए।

उस क्षण सुमन्त्र को ऐसा लगा जैसे केवल तीन व्यक्ति नहीं, सम्पूर्ण अयोध्या उनसे दूर चली गई हो। वन में धूलि उठी और उसी धूलि में उनकी आँखों का संसार धुँधला हो गया। उन्होंने रथ की लगाम थामी। पर हाथ काँप रहे थे। अश्रु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे बुदबुदाए— आज मैंने प्रेम की पराकाष्ठा देखी है। आज मैंने जाना कि धर्म केवल नियम नहीं होता। धर्म प्रेम का ही दूसरा नाम है।

रथ अयोध्या की ओर चल पड़ा किन्तु सुमन्त्र का मन वहीं रह गया— उस वन-पथ पर, जहाँ एक स्त्री ने समस्त राजवैभव को तुच्छ बताकर यह सिद्ध कर दिया था कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं माँगता, साथ माँगता है। सच्चा समर्पण सुविधा नहीं चुनता, सत्य चुनता है।

जहाँ राम के चरण हैं, वहीं उसके लिए समस्त लोकों का सुख, समस्त स्वर्गों का वैभव और समस्त जीवन का अर्थ निहित है।