मन की मरती छाँव है, तन घायल हर रोज़।
व्यथा-कथा भी मौन है, कोई ख़बर, न खोज।। (१)
अन्धे के दरबार में, चीरहरण का खेल।
गूँगे-बहरे हैं जुटे, लँगड़ों का भी मेल।। (२)
‘सधवा’ महँगाई दिखे, ‘विधवा’ दिखे विकास।
‘कायर’ चुप्पी साधकर, ख़त्म कर रहे आस।। (३)
भीषण महँगाई यहाँ, मिले न रोटी-दाल।
राजा अय्याशी करे, प्रजा-बुरा है हाल।। (४)
© आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज।