■ प्रतिक्रिया करके हमने ‘होने’ का परिचय अवश्य दें; क्योंकि ‘शब्दसर्जन’ और ‘शब्दसंधान’ श्रमसाध्य और ‘कष्टसाध्य’ कर्म है।
अभिक्रिया के अभाव मे भविष्य मे इस पाठशाला से आप सभी वंचित रहेंगे।
★ हमारी पाठशाला की ओर से किये गये प्रश्न देखने-पढ़ने मे अत्यन्त आसान और सहज लगते हैं, जबकि वे होते नहीं हैं। (यहाँ ‘लगना’, होना’ तथा ‘जबकि’ शब्दों का किस रूप मे प्रयोग किया गया है, इसे सीखें और सिखायें।)
शब्द :―
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जिला-ज़िला तथा कार्यालय।
जिला―
यह अरबी-भाषा का संज्ञा-शब्द है और लिंग के विचार से ‘पुंल्लिंग’ है। इसका अर्थ है, ‘जनपद’। जिला राज्य का एक ऐसा भाग है, जो ज़िलाधिकारी के अन्तर्गत होता है।
प्राय: बहुसंख्यजन इसे ‘अरबी-भाषा’ के शब्द होने के कारण ‘ज’ मे नुक़्त:/नुक़्ता लगाकर ‘ज़’ का प्रयोग करते हुए, ‘ज़िला’ लिखते और पढ़ते हैं तथा बताते-पढ़ाते हैं, जो कि अशुद्ध है; क्योंकि किस शब्द मे नुक़्त: का व्यवहार कब और क्यों किया जाता है, इसे समझने के लिए अरबी-फ़ारसी-तुर्की-पश्तो-इब्रानी इत्यादिक भाषाओं के मूलभूत व्याकरण का सम्बोध अत्यावश्यक है।
ज़िला–
यह भी ‘अरबी-भाषा’ का संज्ञा-शब्द है; किन्तु लिंग-विचार के आधार पर ‘स्त्रीलिंग’ के अन्तर्गत व्यवहृत होता है। इस ‘ज़िला’ का अर्थ है :― द्युति, ओप, दीप्ति, कान्ति, प्रभा, आभा तथा चमक। सौन्दर्य भी ‘ज़िला’ है। पात्रों (बरतनो) और शस्त्रास्त्रों की चमक को भी ‘ज़िला’ कहते हैं।
कार्यालय―
यह संस्कृत/सम्स्कृत-भाषा का शब्द है। ‘कृत’ शब्द से पूर्व प्रयुक्त उपसर्ग ‘सम्’/’सं’ की अवहेलना करते हुए, यदि कोई किसी भी व्याकरणिक नियम को प्रस्तुत करते हुए, शुद्ध उच्चारण ‘सम्सकृत’ (Samskrita) के स्थान पर ‘सन्स्कृत’ का उच्चारण करता है तथा ‘साङ़्स्कृत’, ‘सौन्स्कृत’, ‘सङ्स्कृत’, ‘सुन्स्कृत’ आदिक शब्दों का व्यवहार बताता है तो वह व्याकरणराहित्य पर बल देता है, जो कि ‘बोली-आधारित’ होता है और बोली का कोई ‘स्वतन्त्र व्याकरण’ नहीं होता। हम किसी भी मूल्य पर किसी भी शब्द से पूर्व प्रयुक्त उपसर्ग को रहित करके सम्बन्धित शब्द का उच्चारण कर ही नहीं सकते; यदि करते हैं तो हम प्रयुक्त उपयुक्त उपसर्ग की ‘हत्या’ करते दिखते हैं, जो उस शब्द-सर्जन/रचना (‘सृजन’ अशुद्ध और निरर्थक नब्द है, जबकि यहाँ ‘शब्दनिर्माण’/ ‘शब्द-निर्माण’ का प्रयोग भी अशुद्ध और अनुपयुक्त है।) से प्राप्त अर्थ को ‘अनर्थ’ की पंक्ति मे रेखांकित करता है।
‘कार्यालय’ शब्द लिंग-विचार की दृष्टि से ‘पुंल्लिंग’ है और संज्ञा-शब्द भी। यह ‘कार्यालय’ शब्द दो उपशब्दों का योग है :― ‘कार्य’ और ‘आलय’। कर्म/कर्त्तव्य करने का स्थान ‘कार्यालय’ कहलाता है। संधि की दृष्टि से ‘कार्य+आलय― अ+आ =आ = कार्यालय है। इस नियमानुसार यह ‘दीर्घस्वर’ संधि का उदाहरण है। समास के विचार से यह ‘षष्ठीतत्पुरुष’ समास का उदाहरण है तथा कारक पर दृष्टि-निक्षेपण करने पर यह ‘सम्बन्धबोधक’ कारक के अन्तर्गत आता है।
अब प्रश्न है, हम ‘कार्यालय’ को ‘जिला’ के साथ रखें वा ‘ज़िला’ के साथ?
उक्त शब्दों के सम्यक् विवेचन से यह सुस्पष्ट हो चुका है कि ‘कार्यालय’ के साथ ‘जिला’ (नुक़्त:रहित) का ही प्रयोग करेंगे।
अब जहाँ तक ‘सजातीय’ शब्द प्रयोग करने का विषय है तो हमारे पास अरबी-भाषा के ही दो शब्द उपलब्ध हैं :― पहला, ‘जिला’ और दूसरा, ‘दफ़्तर’। इसप्रकार शुद्ध शब्द-सर्जन होता है, ‘जिलादफ़्तर’/’जिला-दफ़्तर’/’जिला का दफ़्तर’। अनेक दफ़्तर को ‘दफ़ातिर’ (कार्यालयों) कहते हैं। चूँकि हिन्दी ने बहुसंख्य अभारतीय शब्दों को अपने मे घुला-मिला तथा पचा लिया है, इसलिए हम इसे ‘जिलाकार्यालय’/’जिला-कार्यालय’/’जिला का कार्यालय’/’जिला-स्थित कार्यालय’ के रूप मे ग्रहण कर सकते हैं। आपसे कोई प्रश्न कर सकता है― फिर ‘कार्यालय’ के लिए कौन-सा स्वजातीय शब्द है? आपका तत्काल उत्तर होना चाहिए― ‘जनपद’; ‘जनपदकार्यालय’/’जनपद-कार्यालय’/’जनपद का कार्यालय’।
◆ अब जो लोग नुक़्त:-प्रयोग का विरोध करते आ रहे हैं, उनसे यह प्रश्न है― ऐसे लोग उक्त दोनो शब्दों को यदि ‘जिला’ और ‘जिला’ ही लिखेंगे-लिखायेंगे तथा पढ़ेंगे-पढ़ायेंगे तो शुद्ध और उपयुक्त अर्थ कैसे ग्रहण करेंगे? उसे अपने विद्यार्थियों को किस ‘ध्वनि-सम्प्रदाय’ के अन्तर्गत समझा सकेंगे? निश्चित रूप से ऐसे लोग विफल सिद्ध होंगे।
◆ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन कृति से सकृतज्ञता गृहीत।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)