विद्या-अर्जित करने के लिए संस्कार की आवश्यकता— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज (२३ दिसम्बर) गढ़ाकोटा, सागर-स्थित शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी-विभाग की ओर से ‘अध्ययन-अध्यापन मे हिन्दी-भाषा की उपयोगिता और महत्ता’ विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय कर्मशाला का आयोजन महाविद्यालय-सभागार मे किया गया। इस कर्मशाला मे प्रयागराज से पधारे भाषाविज्ञानी और समालोचक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने उपर्युक्त विषय पर प्रशिक्षणार्थियों को उन शब्दों और उनके व्याकरण-सम्मत प्रयोगों के प्रति ध्यान आकर्षित किया, जो बेहिचक पढ़ाये, लिखाये तथा बताये जाते हैं और उनके प्रति किसी को बिलकुल चिन्ता नहीं रहती।

आचार्यश्री ने सुस्पष्ट शब्दों मे कहा, “यदि तुम्हें किसी गुरु से विद्या प्राप्त करनी हो तो सबसे पहले विनम्र बनो और उस गुरु तक पहुँचने के लिए संस्कार अर्जित करो। यदि वैसा नहीं हो या फिर स्वयं में वैसा करने की इच्छाशक्ति उत्पन्न करने के प्रति कोई रुचि न हो तो विद्याध्ययन के स्थान पर अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप काम करो, अन्यथा तुम्हारे अज्ञान के प्रभाव से उनका अहित हो सकता है, जो विनयशीलता का परिचय प्रस्तुत करते हुए विद्याध्ययन करना चाहते हैं।”

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने पञ्चमाक्षरों को बताया, समझाया, लिखाया तथा उच्चारण किया और कराया उन्होंने बताया, ”’कवर्ग’, ‘चवर्ग’, ‘टवर्ग’, ‘तवर्ग’ तथा ‘पवर्ग’ के पञ्चमाक्षर पर कभी अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जाता; क्योंकि पञ्चमाक्षर मे ही अनुस्वार निहित रहता है। उन्होंने क, ख, ग, घ, ङ का उच्चारण करने के लिए कहा, जिसे सभागार में बैठा हुआ एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था, जो शुद्ध उच्चारण कर सकता था। छात्र-छात्राओं से पूछा जाता था– किस कक्षा मे पढ़ते/पढ़ती हो तब उत्तर मिलता था– सेकण्ड ईयर बी० ए०, फर्स्ट ईयर बी० ए०, थर्ड ईयर बी० ए०, फिर जब उनके द्वारा बताये गये कक्षा की हिन्दी मे अर्थ पूछा जाता था तब एक भी छात्र/छात्रा बता नहीं पाता था। आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने मञ्च से ही कहा, “ये विद्यार्थी कल अध्यापक बनेगे तो अपने विद्यार्थियों को कितनी शुद्ध हिन्दी लिखा, पढ़ा सकेंगे, इसे अति सहजतापूर्वक समझा जा सकता है। जब उन्होंने ‘आरोपी-आरोपित’, ‘परीक्षा-परीक्षा’, ‘व्यंग्य-व्यंग’ आदिक कई शब्दों के कारणसहित सही अर्थ बताने लगे तो सभी विद्यार्थी और अध्यापक चौंक गये।

इसी अवसर पर इसी महाविद्यालय में हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० घनश्याम भारती की दो पुस्तकों :– ‘महात्मा गांधी : विविध सन्दर्भ’ और नयी पीढ़ी के सारस्वत हस्ताक्षर : ‘डॉ० घनश्याम भारती’ का लोकार्पण मुख्य अतिथि आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, निवर्तमान प्राचार्य और विशिष्ट अतिथि डॉ० एस० एम० पचौरी तथा प्राचार्य डॉ० ए० के० सिन्हा ने किया।

इससे पूर्व मुख्य अतिथि ने दीप-प्रज्वलन कर उक्त कर्मशाला का उद्घाटन किया, साथ ही विशिष्ट अतिथि और अध्यक्ष ने साथ देकर “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का वातावरण प्रस्तुत किया। छात्राओं ने सरस्वती-वन्दना की। महाविद्यालय के संरक्षक एवं प्राचार्य तथा आयोजन के अध्यक्ष डॉ० ए० के० सिन्हा ने अतिथिगण का स्वागत किया। अतिथिगण को शाल और प्रतीकचिह्न भेंटकर उनका अभिनन्दन और सम्मान किया गया। छात्राओं ने स्वागतगीत प्रस्तुत किया।

अपने वक्तव्य में निवर्तमान प्राचार्य डॉ० एस० एम० पचौरी ने कहा, “कर्मशालाएँ उनके लिए उपयोगी और महत्त्वपूर्ण होती हैं, जो अपने भविष्य को समुज्ज्वल बनाने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। डॉ० घनश्याम भारती की दोनो पुस्तकें अति महत्त्व की है, जिन्हें तुम सभी को पढ़ना चाहिए।”

मुख्य अतिथि आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “पुस्तकें उन्हीं पर लिखी जाती हैं, जिनके कर्तृत्व उत्तम कोटि के होते हैं।
अन्त में कर्मशाला में आसक्त और अनासक्त भाव के साथ भागीदारी कर रहे सहभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किये गये। सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और सञ्चालन डॉ० घनश्याम भारती ने किया।

इस अवसर पर विनोद बागरे, आकृति खरे, डॉ० सौरभ पटेल, भगवतदत्त पाण्डेय, नीलेश दुबे, नरेन्द्र पटेल, ममता अहरिवार आदिक उपस्थित थे।