©जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज)
बनना न चौकीदार सजन, तुमको घर के अन्दर रहना है; यदि शौक है पहरेदारी की, तो सीमा पर जाकर लड़ना है। न संसद की चाह रखो, न मन्त्रालय की सौदेबाजी; तुम्हे देश की धड़कन बनकर, सबकी रग-रग में बहना है। न जंतर-मंतर का प्रलाप, न केरल का वह बीफ़ काण्ड; तुमको तो मिग-21 की, वो जलती ज्वाला बनना है। न कोलकाता का चिटफण्ड घोटाला, न हरियाणवी चौटाला; तुमको तो ‘अभिनन्दन’ के, सीने की चौड़ाई-सा बढ़ना है। न राम रहीम की गुप्त गुफ़ा, न रामपाल का किला बनो; तुमको तो अब कश्मीर की, सीमाओं से आगे चढ़ना है। ऐसे चुनाव से अच्छा है, दुश्मन को चुन-चुन कर मारो; क्या अन्दर क्या बाहर, अब पत्थर से ही पत्थर गढ़ना है। बहना के राखी की सौगन्ध तुम्हे, पिता के सपनों का नाता; भुला के माथे की बिन्दिया, गर्व तुम्हें सब पे मढ़ना है।