— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
गयी हाथ से नौकरी, लोग हुए बेकाम।
नमो-नमो का जप करो, बोलो जयश्रीराम।।
दो–
शर्म-हया सब पी गये, छान पकौड़ा तेल।
जनता जाये भाँड़ में, अजब-ग़ज़ब का खेल।।
तीन–
थपरी मारो प्रेम से, उत्तम बना प्रदेश।
गुण्डे हैं चहुँ दिशि मगर, ख़ाली है संदेश।।
चार–
निजीकरण के फेर में, हर पल है सरकार।
तानाशाही चरम पर, नहीं कोई दरकार।।
पाँच–
देख रासुका खेल अब, जन-जन है भयभीत।
भ्रष्टाचारी खेल रच, जश्न मनाते जीत।।
छ: —
भँगुआ रहे विपक्षी हैं, फागुन तो है दूर।
इसको प्यारे बोलते, हुआ रतौंधी सूर।।
सात–
चीरहरण हर पल यहाँ, धृतराष्ट्र है मौन।
रक्षक अब भक्षक बन गये, लाज बचाये कौन।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)