भारत की ‘सत्ता’ की राजनीति में ‘म’ की दमदार उपस्थिति!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


भारत की राजनीति में इस समय ‘म’ का अत्यन्त महत्त्व है, क्योंकि सत्ता प्रत्यक्षत: तीन प्रकार के चरित्रवाले ‘म’ के मुँह लग चुकी है।

‘म की माया’ विलक्षण है। हमारे क्रान्तिधर्मी कवि भक्तिकाल में ही “डंके की चोट पर” कह चुके थे, “माया! महाठगिनी हम जानी।”

माया की ‘माया’ हमने भी देखी, समझी तथा अनुभव की है। वैसे यह समग्र जीव-जगत् ‘माया’ से ओत-प्रोत है। ऐसे में, ‘माया’ से राहित्य भी आसन्न सत्ता-प्रतिष्ठान नहीं दिखता। अब तक जितने भी ‘नरेन्द्र'(शासक) हुए हैं, सभी ‘माया’ के वशीभूत रहे हैं। जिसे ‘माया’ व्यापती नहीं, वह ‘परा-प्रकृति’ शक्ति में रूपान्तरित हो जाता है। हमारे नरेन्द्र तो सोते-जागते, उठते-बैठते, विचरण करते ‘माया’ के प्रति आसक्त रहे हैं, पौराणिक-ऐतिहासिक ग्रन्थ साक्षी हैं।
माया ‘निर्मोही’ होती है, इसीलिए अपने हृदय में ‘ममता’ को स्थायी रूप से स्थान नहीं देती और ‘नरेन्द्र’ को अपने बाहुपाश में ऐसे आबद्ध कर लेती है, मानो कोई प्राणी ‘आत्म मुग्धता’ की भेंट चढ़, अपना सारा विवेक खो रहा हो।

‘म’ के ये तीनों प्रकार अत्यन्त ‘कठोर’ हैं, परन्तु दो प्रकार के ‘म’ के साथ स्थिति को भाँपते हुए, समन्वय और सामंजस्यकारी भूमिका का निर्वहन करनेवाला ‘मुलायम’ कोटि का ‘म’ अब ‘म’ के संयोग से रचित ‘माया’ का महिमा-मण्डन करते हुए, ‘म’ की ममता की निर्ममता को सहलाने का काम कर रहा है।

अब यह रोचक परिदृश्यात्मक प्रश्न भारत की राजनीति की एक महत्त्वपूर्ण दिशा निर्धारित करनेवाला है— वर्तमान ‘नरेन्द्र’ जो अपने ‘म’ का प्रतिनिधित्व करनेवाले ‘मोदी’ हैं, राजनीतिक ‘माया’ के वशीभूत हो, एक अन्य ‘म’ की पोषिका ‘ममता की निर्ममता’ का आघात पाकर संन्यस्त हो जायेंगे अथवा अपनी ‘प्रभुता’ बनाये रखेंगे?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २५ जुलाई, २०१८ ईसवी)