अभिव्यंजना

     (एक)

चमकता चाँद-सा बदन,
न चुरा अनकहा कथन।
पतंगी रूप अब अपना,
उड़ाये कब कहाँ पवन?

     (दो)

तेरा चुप भी इक सवाल है,
हमे अब न कोई मलाल है।
यहाँ हर ख़याल है सो रहा,
अब यहाँ बोल है न चाल है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ दिसम्बर, २०२४ ईसवी।)