● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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(एक)
चमकता चाँद-सा बदन,
न चुरा अनकहा कथन।
पतंगी रूप अब अपना,
उड़ाये कब कहाँ पवन?
(दो)
तेरा चुप भी इक सवाल है,
हमे अब न कोई मलाल है।
यहाँ हर ख़याल है सो रहा,
अब यहाँ बोल है न चाल है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ दिसम्बर, २०२४ ईसवी।)