इसे कहते हैं, ‘दलितप्रेम’ का घटिया नज़ारा

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


सरकारी दलितप्रेम प्रदर्शित करनेवालो!
तुम सबके भीतर वास्तव में, यदि दलितप्रेम है तो अपने बेटी-बेटों की शादी दलित-परिवारों में कराकर दिखाओ।
पंच सितारा होटलों से भाँति-भाँति के व्यंजन मँगवाकर सरकारी दलितों के घरों में ‘रेड कॉरपेट’ लगवाकर, नये-नये चमकते बरतनों में सजाकर सरकारी मेहमानों के सामने परोसे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, जिन-जिन गाँवों में वे सब तथाकथित दलितप्रेम दिखाने के लिए जाते हैं, वहाँ की सारी ‘सरकारी मशीनरी’ के कल-पुर्ज़े ‘फेल’ हो जाते हैं; तहसील-कचहरी, ज़िलाप्रशासन से लेखपाल, पटवारी, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, निबन्धन अधिकारी, खण्ड विकास अधिकारी, परियोजना अधिकारी, उपज़िलाधिकारी, अतिरिक्त ज़िलाधिकारी, ज़िलाधिकारी आदिक सरकारी मेहमानों की ‘जी-हुज़ूरी’ में लगे रहते हैं। इसे तीन दिनों पहले सोराँव तहसीलान्तर्गत, इलाहाबाद ज़िले के सरकारी दलित गाँव ‘बिजलीपुर’ में केशव प्रसाद मौर्या नामक उत्तरप्रदेश सरकारी मशीनरी का एक बड़ा पुर्ज़ा पहुँचा था, जिसकी सेवा में अपना मान-सम्मान खोकर, जनता के कामों की उपेक्षा करते हुए, पी०सी०एस०-आई०ए०एस०-अधिकारी उस सरकारी मेहमान के आवभगत में ‘पलक-पाँवड़े’ बिछाये हुए थे।
नरेन्द्र मोदी, अमित शाह से लेकर सारे छुटभय्ये ‘सरकारी दलितों’ के यहाँ जाकर ‘पिकनिक’ मनाने का अभियान छेड़ रखे हैं; परन्तु ‘वोट की राजनीति’ अब सामने आ चुकी है और देश के मतदाता उन सारे माननीयों को अगले चुनाव में पाठ पढ़ाने के लिए ठान लिया है।
अब प्रश्न है, विद्यार्थी जी-तोड़ मिहनत कर पी०सी० एस०-आई०ए०एस० अधिकारी इसीलिए बनते हैं कि शिक्षा और अनेक स्तरों पर स्वयं से बहुत नीचे ऐसे ‘सरकारी माननीयों’ के सामने ‘दुम’ हिलाते रहें? यह भी सच है कि जब तक वे दुम हिलाते रहते हैं, लोककल्याण की योजनाएँ फाइलों में धूल चाटती रहती हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २ मई, २०१८ ई०)