चिन्तनः चितइ-चितइ ‘चितवन पुहुप’, रूकि थमि मनु मुसुकाइ।
यह चितवन का वृक्ष है। इसकी पुष्पीभूत अवस्था इसे आनन्दातिरेक कर रही है। शरदागमन के साथ ही इसका पुष्प शृंगार आरम्भ होता है ।
शुकी-श्वेत आभायुक्त इसके पुष्प गुच्छ प्रात व संध्या का सहर्ष स्वागताभिवादन करते हैं । मधुलोभी कीट क्षुधातृप्ति हेतु अतृप्त हो मौन गान करते हैं । रंग, बहुरंग शृंगार बहिरंग धारणी है और आँखों से ही अनुभूतमान होते हैं । रस तो भीतर की, अन्तस की ऊर्जा है। गंध अस्तित्व का मधुरतम सूक्ष्मतम तत्व है, मादकता है, प्रवाह है; यही सम्पूर्णता में कार्य-कारण बनता है। जगतीतल की ऐषणाओं से पूर्ण ऐन्द्रजालिक मधुरस में निमज्ज्ति कराता है। देखने वाले इसकी ओर आकृष्ट नहीं होते हैं क्योंकि यह ललाभ नहीं है। शृंगार आकर्षक हो तो ही भावोत्तेजन होता है । भाव शृंगार, भौतिक शृंगार से श्रेष्ठ होता है। मनुष्येतर जीवों का दर्शन प्रकृति के परम व्योम को चूमने का प्रयास, इसे एकलरूपायन व एक-नामी मौनवृती योगी का आचरण आवृत करता है। इसलिए ‘चितवन’ संसार को अपने ही समान मधुमय देखने, मधुमय बनाने और जीवन को आशावादी बने रहने का शीतल संदेश देता है, शरद पूर्णिमा के चन्द्रलोक की भाँति।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदय शरद पूर्णिमा,
बाल्मीकि जयन्ती
दिनाँक- 30/10/2020