मैं वायु सेना में सेवा के दौरान हैदराबाद के वायुसेना अकादमी के बाहर सिविल एरिया (अन्नाराम) में फैमिली के साथ किराए पर रह रहा था। मेरे घर के पीछे रहने वाले एक हैदराबादी सज्जन खाने-पीने वाले आदमी थे। पीने बोले तो सुरा के कुछ ज्यादा ही शौकीन उनसे मेरी हाय-हैलो भर की जान पहचान थी। एक दिन मेरे पास आए और बड़े दीन-हीन स्वर में बोले –
“साआआर! मेरा लड़की का तबीयत बहुत खराब है। 200 रुपये दे दीजिए, काल वापस कर दूंगा। “
उनकी बच्ची की बीमारी की बात सुनते ही मैंने बिना कोई सवाल-जवाब किये उन्हें तुरंत ₹200 दे दिए। हालांकि उसी शाम मुझे श्रीमती जी ने बताया कि उनकी बिटिया तो छत पर दौड़ -भाग कर रही थी, कहीं से बीमार नहीं लग रही थी। मैंने उन्हें और खुद को भी समझाया कि बच्चे बीमार और स्वस्थ दोनों ही जल्दी हो जाते हैं। ठीक हो गई होगी, अच्छी बात है।
इस घटना के बाद महीनों बीत गए लेकिन हैदराबादी भाई साहब पैसे वापस करने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उस समय मेरे लिए ₹200 भी छोटी रकम नहीं हुआ करती थी। मुझे यह भी लगा कि वह मुझसे बचने की कोशिश कर रहे थे, जानबूझकर मेरे सामने नहीं आते थे। लेकिन एक रोज भाई साहब गलती से टकरा गए, तो मैंने उनसे पूछा कि आजकल आप दिखते ही नहीं हो?? आपकी बच्ची का इलाज हुए तो महीनों बीत गए लेकिन आपने पैसे अब तक वापस नहीं किए। कोई कारण भी नहीं बताया।
इस पर उन महोदय ने बड़ी मासूमियत से कहा –
“साआर !! ईद से पहले दे दूंगा।”
मैंने आपत्ति जताई कि ईद आने में तो अभी कई महीने बाकी हैं। इतने दिन बाद क्यों?? तो वह बोल पड़े-
” नहीं साआर, 10 दिन बाद ही तो ईद है । “
” आंय!! 10 दिन बाद कौन सी ईद है?? मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। सरकारी कर्मचारी को सारे त्योहारों की तिथि एक साल पहले से पता होती है। “
” अरे साआर, 05 अक्टूबर को ईद है न!” भाई साहब पूरे विश्वास से बोले।
“05 अक्टूबर को ईद नहीं, दशहरा है। उस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने दंभी और पापी लंकापति रावण का वध किया था।” मैंने उन्हें सनातनी ज्ञान दिया।
“अरे साआर!! हम लोग सभी त्यौहार को ईद ही कहते हैं। हमारे लिए दशहरा भी ईद है और दीवाली भी। ईद तो खैर ईद है ही।” भाई साहब ने उल्टे मेरा ज्ञानवर्धक कर दिया।
लेकिन इस ज्ञान को पाकर मैं कुछ सोच में पड़ गया। फिर जरा गंभीर होकर उनसे कहा-
” हमें अपने सनातनी त्योहारों को ईद न कहना पड़े। पुरुषों को बड़े भाई का कुर्ता और छोटे भाई का पायजामा न पहनना पड़े। महिलाओं को काली पानी की टंकी न बनना पड़े । इसके लिए ही हमारे पुरखे लड़ते, मरते , बलिदान होते रहे। जिन्होंने भय या लालच के कारण अपने त्योहारों को ईद मानना स्वीकार कर लिया, करोड़ों लोगों की बलि देकर अपने लिए मजहब के आधार पर अलग राष्ट्र ले लिया, आज वह हमें सेक्युलरिज्म का ज्ञान दे रहे हैं , हमें ही असहिष्णु बता रहे हैं।”
इससे पहले कि मैं और गंभीर होता , भाई साहब मौका देखकर पतली गली से निकल लिए। फिर न कभी ईद आई, न भाई साहब मिले। मैं जरूर हैदराबाद से बैरकपुर पहुंच गया।
(एयर वेटेरन विनय सिंह बैस)