किसी की लाचारी को ‘बहादुरी’ मत कहो

त्वरित टिप्पणी

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

चित्र में जो लड़की दिख रही है, उसका नाम ज्योति कुमारी है। वह दरभंगा के ‘कमतौल’ क्षेत्रान्तर्गत ‘सिरहुल्ली’ गाँव की रहनेवाली एक अति निर्धन परिवार की बेटी है। उसकी अवस्था १५ वर्ष बतायी गयी है। उसके पिता मोहन पासवान हरियाणा के गुरुग्राम में रहते थे, जो एक दुर्घटना में घायल हो गये थे। इस कारण वे अपने घर लौटने में समर्थ नहीं थे। उनके साथ रह रही बेटी ने अपने पिता को गाँव पहुँचाने के लिए बहुत हाथ-पैर मारे थे; परन्तु किसी का दिल नहीं पसीजा; अन्तत:, १० मई को उसने निर्णय किया और उसी क्षण अपने अस्वस्थ पिता को साइकिल के ‘कैरियर’ पर बैठाकर ‘हरियाणा से बिहार’ के लिए चल पड़ी। इस प्रकार उसने लगभग १,२०० किलोमीटर तक साइकिल-चालन कर अपने अस्वस्थ पिता को १६ मई को घर तक पहुँचाया।

अब प्रश्न हैं, तथाकथित ‘कोरोना योद्धाओं’ ने उस वास्तविक निरुपाय-निश्शक्त-निस्सहाय बालिका को क्यों नहीं रोका? उनके लिए गन्तव्य तक जाने के लिए यथोचित व्यवस्था क्यों नहीं की/करायी? उसने जब अपनी बाध्यता-विवशता बतायी होगी तब ‘कोरोना योद्धाओं’ का हृदय पसीजा नहीं?..!

आज जो भी लोग उस लाचार बालिका की पीठ ठोंक रहे हैं, उन्हें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए– उस लाचार और बेचारी बालिका की समुचित सहायता क्यों नहीं की गयी, जिसके कारण उसे एक सप्ताह तक हज़ारों किलोमीटर तक पिता को बैठाकर साइकिल चलानी पड़ी थी। उन दोनों ने अपनी रातें कहाँ और कैसे काटी होंगी और चिलचिलाती धूप में ‘भारत की बेटी’ के तन-मन कितनी बार आहत हुए होंगे। भूखे-प्यासे ‘निरीहता का परिचयपत्र’ अपने सीने से लगाये वह १५ वर्षीया कितने प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों से घिरे पैडिल मारती ‘न्यू इण्डिया’ के व्यवस्था-तन्त्र पर आँसू गिराती अपनी नियति को कोस रही होगी।

अब जब वह बेशुमार कण्टकाकीर्ण मार्गों से गुज़रने के बाद जब घर पहुँची है तब मीडिया-राजनीति-सहित प्रशासन के बेईमान अधिकारी तथा न जाने कितने लोग उसकी पीठ ठोंक रहे हैं; उसे उसकी बहादुरी पर गर्व कर रहे हैं। अरे मक्कारो! दो बूँद आँसू तो टपका लो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ मई, २०२० ईसवी)

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय