डॉ० घनश्याम भारती : एक निष्णात सारस्वत हस्ताक्षर

● आचार्य पं० पृथ्वीनाध पाण्डेय

प्रियवर डॉ० घनश्याम भारती जी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गढ़ाकोटा, सागर (मध्यप्रदेश) मे हिन्दीविभागाध्यक्ष और राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सारस्वत आयोजनों के सूत्रधार हैं। वे मेरे परम प्रिय शिष्य हैं और अध्ययन-अनुशीलन के प्रति एक निष्ठावान अध्येता भी।

स्नेहिल (प्रेमयुक्त) डॉ० भारती जी का भाषा और साहित्य के प्रति अनुरागात्मक बोध श्लाघ्य है। वे हिन्दीसाहित्य के विस्तार मे इतने रच-बस गये हैं कि प्रत्येक समय– किस विषय पर पाण्डुलिपि का प्रणयन कर, उसे पुस्तक के रूप मे सार्वजनिक करना है; किस प्रासंगिक विषय पर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गढ़ाकोटा, सागर (मध्यप्रदेश) के भव्य सभागार मे राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन करना है; महाविद्यालय की वार्षिकी ‘सृष्टि’ के लिए इस वर्ष कौन-सा विषय-विशेष-निर्धारण करना है– उनके चिन्तन-अनुचिन्तन का विषय बना रहता है।

यह एक संयोग ही है कि सारस्वत हस्ताक्षर डॉ० घनश्याम भारती जी का मुझसे जिस दिनांक से सम्पर्क हुआ था, उसी समय से अब तक उनकी प्रत्येक योजना की प्रारूप-रचना, उनका परिमार्जन, परिष्कार, परिवर्त्तन, परिवर्द्धन तथा उसके क्रियान्वयन् के प्रत्येक पक्ष के साथ मेरी सक्रिय सम्बद्धता बनी हुई है।

आज डॉ० भारती जी सारस्वत शिखर पर आरूढ़ होकर अपने गन्तव्य की ओर अग्रसर हो चुके हैं। मैं उनके आत्मिक उत्कर्ष की कामना करता हूँ।