मेरी यह टिप्पणी उन सभी के लिए है, जो मुझे किसी भी राजनीतिक दल के प्रवक्ता के रूप में अपने विकृति दृष्टिपथ पर लाकर वर्षों से देखते और प्रतिक्रिया करते आ रहे हैं :–
मैं उन अवसरवादियों में से नहीं, जो ‘अवसरजीवी’, ‘क्षुद्रजीवी’ तथा ‘बहुरूपजीवी’ होते हैं; मैं तो “डंके की चोट” पर वही कहता, लिखता तथा करता हूँ, जो सत्य और समीचीन होता है। मैं अपने लेखन से उनको जाग्रत करता हूँ, जो मोहान्ध होकर सुसुप्तावस्था में पाये जा रहे हैं। मेरा प्रत्येक विषय राष्ट्रहित में होता है, न कि किसी दलविशेष अथवा व्यक्तिविशेष के पक्ष अथवा विपक्ष में। दो टूक विषय-प्रवर्त्तन करता हूँ :– किसी को अच्छा लगे अथवा बुरा, इसकी कहीं-कोई चिन्ता नहीं। और हाँ, किसी से कहता भी नहीं कि वह मेरा लिखा पढ़े। शब्द में मति, रति, शक्ति तथा गति होगी तो वह अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना, किसी भी रूप में पाठक का वक्षप्रान्त चीरकर उसकी अन्तश्चेतना को झिंझोड़ कर रख देगी। मैं किसी का ‘क्रीतदास’ नहीं हूँ। अपनी जय-पराजय की पटकथा ‘स्वयं’ लिखता हूँ। व्यक्तिपूजक कुत्सित प्रवृत्ति के ऐसे तथाकथित बुद्धिजीविगण में मेरे सम्प्रेषण को समझकर विषय-केन्द्रित टिप्पणी करने की क्षमता हो तभी टिप्पणी करें, अन्यथा अन्यत्र जाकर विषयान्तर ‘भाष्यलेखन’ करें अथवा पूर्वग्रह प्रवक्ता का दायित्वनिर्वहन करें; क्योंकि अन्यथागामी मानसिकतावालों को तत्काल प्रभाव से ‘निरुद्ध’ कर देता हूँ।
मेरी जाग्रत शिष्य-शिष्याओं का एक बृहद् समूह उत्तर-भारत में है, जिनकी संख्या लाखों में है। मैं विशेषत: उनमें प्रखरता और मुखरता का स्वस्थ और सकारात्मक शब्दबीज का वपन करता हूँ, ताकि वे आत्माभिमान से डिग न सकें और उनका गन्तव्यमार्ग कोई भी अवरुद्ध करने का दुस्साहस न कर सके; क्योंकि वे मेरे प्राणतत्त्व हैं और उनकी प्रत्येक आह-संवेदना में मैं उनके संग-साथ हूँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २२ दिसम्बर, २०१८ ईसवी)