● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
रूप-रंग की हाट मे, भाँति-भाँति-तस्वीर।
राँझा बिकते हैँ कहीँ, कहीँ बिक रहीँ हीर।।
दो–
धर्म-पंथ औ’ जाति की, बिगड़ गयी है रीति।
ऐसे मे कैसे भला, गले मिलेगी प्रीति।।
तीन–
रुपया-रुतबा-रूपसी, बहुत भयंकर रोग।
सत्ता-धर्म गले मिलेँ, अजब-ग़ज़ब संयोग।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अक्तूबर, २०२४ ईसवी।)