‘गूँज कलम की’ के मंच पर हुई आशुलेखन प्रतियोगिता

पटना- “गूँज कलम की” राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था, पटना (बिहार) के मुख्य मंच के वाट्स एप समूह पर गत शनिवार को रात्रि 9 से 10 बजे तक आशुलेखन प्रतियोगिता सम्पन्न हुई।

मंच संचालक सुशी सक्सेना, इंदौर मप्र ने बताया कि इस आशु लेखन प्रतियोगिता में देश के विभिन्न भागों से 18 कवियों को आमंत्रित किया गया था।

सरस्वती वंदना व मंच स्थापना के पश्चात कवियों को….
“संभलकर चलना सीखा देती है ठोकरें” पंक्ति दी गई और इस पर रचनाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए शानदार रचनाएँ लिखकर अपनी कलम का लोहा मनवाया। मंच प्रभारी कृष्ण चतुर्वेदी, बूंदी (राज.) से, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी डॉ. राजेश शर्मा पुरोहित, भवानी मण्डी (झालावाड़) से तथा डॉ. स्नेह लता द्विवेदी, पटना (बिहार) से उपस्थित होकर कवियों की लेखनी का कमाल देखते रहे।

पहले 20 मिनट में ही लिटरेरी ब्रिगेडियर सरिता कुमार ने फरीदाबाद से लिखा….
“जो कुछ सीखा नहीं पाते हमें माता-पिता, वह सब सीखा देती है ठोकरें।”

इसके बाद सुशी सक्सेना ने इंदौर से कलम का तेवर कुछ यूँ दिखाया…
“हर कोई चाहता है अपने किरदार में रहना।
वक्त के साथ बदलना सीखा देती है ठोकरें।।”
अजमेर (राज.) से डाॅ.नीलम लिखती है….
“थी जवानी जोश भरी,
जमीं खिसक गई पांव के नीचे से।

बड़ौदरा, गुजरात से कल्पना क्षत्रिय ने अच्छे बुरे एहसास के रूप में इसे लिखा तो कवयित्री कविता गुप्ता, लखनऊ ने “जमाकर पांव रखने का हुनर चाहिए” कहकर शानदार कविता लिखी।

दीपमाला साहू, छत्तीसगढ़ ने अपना दर्द यह कहकर जताया….
“थोड़ा तो तजुर्बा है हमें जिंदगी का।
जीती बाजी यहाँ हार जाते है लोग।।”

देहरादून से आये कवि नंद किशोर ‘बहुखंडी’ ने पौराणिक ऐतिहासिक कथाओं से संदर्भित कर जीवन के अनुभवों को प्रकट किया तो जयपुर (राज.) की कवयित्री सरोज कंवर शेखावत ने कुछ यूँ जोड़ा…
“सुरु भी लिखती है दिल की बातें,
गीतों में ढलना सिखाती है ठोकरें।।”

कवि योगेंद्र प्रसाद अनिल, औरंगाबाद (बिहार) ने भारतीय राष्ट्रवाद से जोड़कर देशभक्तों को नमन करते हुए कहा…
“भारत माँ के बहते आसूँ पोंछने है।
भगत सिंह, भीम, फूले के अरमानों से।।”

वरिष्ठ गीतकार कवि जुगल किशोर पुरोहित, बीकानेर ने मुश्किलों में डटे रहने का आह्वान किया…
“कभी हिम्मत न हारना दोस्तों,
जिंदगी तो सुख दुख का नाम है।।”

बीकानेर, राजस्थान से युवा कवयित्री ज्योति ने बहुत सुंदर कविता लिखी…
“जिंदगी की राह में मजबूती से चलना सीखा देती है ठोकरें।”

एस के कपूर, बरेली ने अंदर की ताकत से जीवन के अनुभवों को जोड़कर अच्छी रचना लिखी।

डॉ.संजू त्रिपाठी, लखनऊ से उपस्थित हुई तो यह फलसफा बयां करती है कि…
“इस दुनिया से हर राज छुपाना पड़ता है।
दिल में हो लाखों ग़म पर मुस्काना पड़ता है।”

मंडला, मप्र से आये कवि प्रोफेसर (डॉ.)शरद नारायण ने ठोकरों को शिक्षक मानते हुए अनुभव के नर्मदा नीर से बहुत सुंदर सृजन किया…
“ठोकरें इंसान को है सुधारती,
फिर फिर गिरने से बचाती है।।”

अंत में समूह प्रभारी कृष्ण चतुर्वेदी, बूंदी राजस्थान ने यह कहते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा कर सभी कलमकारों का धन्यवाद ज्ञापित किया…

कविवर आप सुजान है,हम बालक नादान।
सधे कदम पाएँ कहाँ,हो गये लहुलुहान।।

कोई तो जयसिंह हो,कहाँ बिहारीलाल?
कोई ढोए पालकी,बिछा स्वर्ण के जाल।।

याद करो कवि गंग को,भूल गये क्यों आज।
कवि चंद की वाणी सुन, बने सिंह सरताज।।