आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की काव्यदृष्टि

एक–
जीवन-जरा ज़रा जरा, पात घास औ’ फूस।
उष्मा-ऊर्जा क्षरित-सी, रक्तराशि ले चूस।।
दो–
निर्गम निष्कासन निकष, उत्पाती बन राग।
जरे देह-कंचन-सदृश, फफक उठी हो आग।।
तीन–
भेदी भाड़ा-भीरु भर, मतिरतिगति का खेल।
कंस-वंश अवतंस रिपु, मानो हों विष-बेल।।
चार–
पाप पंक प्रसून पुन:, काम-क्रोध-मद-लोभ।
धैर्य धरा लक्षित नहीं, व्यापक होता क्षोभ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जून, २०२२ ईसवी।)