प्रश्नो के घेरे मे ‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ की परीक्षा-पद्धति (?)

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वर्षों से उत्तरप्रदेश मे शिक्षा के समस्त विभागों मे अराजकता व्याप्त है; भ्रष्टाचार दिखता आ रहा है तथा निरंकुशता दिखती आ रही है। हमारे वास्तविक मेधावी और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के भविष्य के साथ क्रूर छल किया जाता रहा है। जिस प्रकार से बहुसंख्य विद्यार्थियों को अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण किया जा रहा है, उससे निकट भविष्य मे 'बेरोज़गारी का ताण्डव' सर्वत्र दिखेगा। उत्तरप्रदेश मे पहले किसी भी कक्षा के किसी भी विषय की पुस्तकें जब पाठ्यक्रमनिर्धारण-समिति एक बार निर्धारित कर देती थी तब वह कई दशक ('दशकों' अशुद्ध है; क्योंकि यह 'दस का समाहार'/'समूह' है।) तक पढ़ा जाता था। यहाँ तक कि एक ही विषय कि पुस्तकें अनेक पीढ़ियाँ पढ़ती रहती थीं, जो कि एक आदर्श शिक्षण-पद्धति थी। इधर, कुछ वर्षों से प्राय: प्रतिवर्ष पुस्तकों मे परिवर्त्तन करा दिया जा रहा है। पाठ्यपुस्तकों मे  किसी पाठ को अपनी सुविधा के स्तर पर रखने और उसमे से किसी के हटाने से विद्यार्थियों को नयी पुस्तकें क्रय करनी पड़ती थीं, जिससे मातापिता और अभिभावकों पर 'अतिरिक्त' भार पड़ता जा रहा है। इसके प्रति उत्तरप्रदेश-शासन और उसका सम्बन्धित विभाग बिलकुल संवेदनशीर नहीं दिखता। हम यह देखते आ रहे हैं कि इधर सरकार बदलती है उधर शिक्षण-संस्थाएँ प्रभावित होने लगती हैं। सरकार उन पर तरह-तरह के नियम थोप देती है, जिनसे विद्यार्थी, उनके माता तथा अभिभावक दुष्प्रभावित होते हैं।
 
उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् को विश्व की सबसे बड़ी परीक्षा-संस्था माना जाता है; क्योंकि उस परिषद् की ओर से आयोजित हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षाओं मे प्रतिवर्ष ५० लाख से अधिक छात्र-छात्राएँ सम्मिलित होती हैं, जो कि विश्व के किसी भी शिक्षासंघटन की ओर से आयोजित किसी भी परीक्षा मे सम्मिलित छात्र-छात्राओं की सर्वाधिक संख्या है। 

नवीनतम आँकड़े बोलते हैं कि वर्ष २०२३ की हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट-परीक्षाओं मे कुल ५८ लाख ८४ हज़ार ६ सौ ३४ परीक्षार्थियों का पंजीयन हुआ था, जिनमे से हाईस्कूल के लिए ३१ लाख १६ हज़ार ४ सौ ५४ विद्यार्थी पंजीकृत थे, जबकि २७ लाख ६८ हज़ार १ सौ ८० विद्यार्थी इण्टरमीडिएट के लिए पंजीकृत किये गये थे। उनमे से २५ लाख ६८ हज़ार ३ सौ ६७ विद्यार्थी संस्थागत और १ लाख ८२ हज़ार ५ सौ ४ व्यक्तिगत विद्यार्थी थे। इस बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ योगी के आदेशानुसार, परीक्षाओं मे अनुचित साधनो के उपयोग करने पर ‘एन० एस० ए०’ और ‘गैंगस्टर एक्ट’ लगाने के भय का प्रभाव यह रहा कि हाईस्कूल के २ लाख ८ हज़ार ९ सौ ५३ विद्यार्थियों ने परीक्षा छोड़ दी थी, जबकि २ लाख २२ हज़ार ६ सौ १८ इण्टरमीडिएट के विद्यार्थी परीक्षा-अनुशासन से डरकर भाग खड़े हुए थे। वैसे प्रतिवर्ष परीक्षाभय के कारण परीक्षार्थी परीक्षा छोड़ते आ रहे हैं।

उत्तरपुस्तिकाओं के परीक्षण और मूल्यांकन के लिए २५८ परीक्षण-केन्द्र बनाये गये थे, जिनमे से ८३ शासकीय और १७५ सहायता-प्राप्त शिक्षणसंस्थान थे। वहाँ हाईस्कूल की लगभग १ करोड़ ८६ लाख उत्तरपुस्तिकाओं के परीक्षण करने के लिए ८९ हज़ार ६ सौ ९८ परीक्षक लगाये गये थे। १ करोड़ ३३ लाख इण्टरमीडिएट की उत्तरपुस्तिकाओं के परीक्षण और मूल्यांकन किये गये थे, जिनके लिए कुल ५४ हज़ार २ सौ ३५ परीक्षकों को दायित्व सौंपा गया था। इसप्रकार कुल उत्तरपुस्तिकाओं की संख्या ३ करोड़ १९ लाख थी, जिनके परीक्षण १ लाख ४३ हज़ार ९ सौ ३३ परीक्षकों ने किये थे।

इसप्रकार हाईस्कूल-परीक्षा मे शामिल होनेवाले परीक्षार्थियों की कुल संख्या २८ लाख ६३ हज़ार ६ सौ २१ थी, जिनमे से कुल २५ लाख ७० हज़ार ९ सौ ८७ परीक्षार्थियों उत्तीर्ण हुए हैं। यदि उनका प्रतिशत समझें तो ८९.७८ प्रतिशत विद्यार्थी हाईस्कूल मे उत्तीर्ण हुए हैं, जिनमे से ८६.६४ प्रतिशत छात्र हैं और ९३.३४ प्रतिशत छात्राएँ। विद्यार्थियों के लिए संतोष का विषय है कि इस वर्ष का परिणाम गत वर्ष की तुलना मे बेहतर रहा है। यदि एक दशक के परीक्षाफल पर नज़रें दौड़ायें तो इस वर्ष का परीक्षाफल सर्वोत्तम दिख रहा है। इस वर्ष के परिणाम मे छात्रों के उत्तीर्ण-प्रतिशत मे १.३९ और छात्राओं मे १.६५ की वृद्धि हुई है।

प्राय: देखा जाता रहा है कि इण्टरमीडिएट मे उत्तीर्ण विद्यार्थियों का प्रतिशत हाईस्कूल मे उत्तीर्ण विद्यार्थियों की तुलना मे अत्युत्तम रहता आया है, जबकि इस वर्ष का परीक्षा-परिणाम निराशाजनक रहा है। इण्टरमीडिएट की परीक्षा मे कुल ७५.५२ प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए हैं। हमेशा की तरह यहाँ भी छात्राएँ अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए दिख रही हैं। जहाँ ६९.३४ प्रतिशत छात्र उत्तीर्ण हुए हैं वहीं ८३ प्रतिशत छात्राएँ उत्तीर्ण हैं। परीक्षार्थियों के लिए दु:खद स्थिति यह है कि इस वर्ष परीक्षाफल मे ९.८१ प्रतिशत की गिरावट आयी है।
बताया यह जा रहा है कि उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् ने एक नया कीर्तिमान स्थापित कर लिया है। परिषद् ने विगत १०० वर्षों मे सबसे पहले परीक्षाफल घोषित कर दिया है। यही नहीं, निर्धारित अवधि से एक दिन-पूर्व ही परिणाम सार्वजनिक करते हुए, माध्यमिक शिक्षा परिषद् के अधिकारी अपने हाथों अपनी ही पीठ थपथपाते दिख रहे हैं। स्मरणीय है कि १८ मार्च से ३१ मार्च की अवधि के भीतर ही ३ करोड़ १९ लाख उत्तरपुस्तिकाओं का परीक्षण कराया गया था और मूल्यांकन भी।

विचारणीय है कि जिस यान्त्रिक गति मे बाध्यता के साथ करोड़ों की संख्या मे उत्तर-पुस्तिकाओं का परीक्षण और मूल्यांकन कराया गया है, उससे परीक्षाफल का प्रभावित होना निश्चित है। ऐसी दशा मे यदि कोई विद्यार्थी शीर्ष स्थान अर्जित करता है तो उसके प्रति ‘संदेह’ का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जो विद्यार्थी वास्तव मे, मेधायुक्त होते हैं, उनके साथ ‘न्याय’ नहीं हो पाता। ऐसे उदाहरण हमारे आसपास के वातावरण मे बड़ी संख्या मे दिख रहे हैं। हमने अतीत मे देखा भी है कि एक ही विद्यालय के विद्यार्थी शीर्षक्रम मे तीनो स्थान पा जाते हैं, यह ‘विडम्बना’ही तो है।

‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ का इतिहास रहा है कि उससे सम्बन्धित बहुसंख्य विद्यालयों के प्रमुख लोग अनुचित माध्यम से परीक्षार्थियों को बहुत अच्छे अंकों मे उत्तीर्ण कराने का ठीका (यहाँ ‘ठेका’ अशुद्ध है।) लेते आ रहे हैं। उत्तरप्रदेश की सम्भवत: कोई ऐसी परीक्षा हो, जिसके प्रश्नपत्र परीक्षा से पूर्व सार्वजनिक न होते हों; कुछ सामने आ जाते हैं तो कुछ छिपा लिये जाते हैं।

ऐसे-ऐसे विद्यालय हैं, जहाँ विद्यार्थी प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं; परीक्षाप्रपत्र भरकर जमा कर देते हैं, फिर सीधे परीक्षाभवन मे ही दिखायी पड़ते हैं। वैसे विद्यार्थी और उनके मातापिता/अभिभावक अनुचित साधन अपनाने अथवा उत्तरपुस्तिकाओं मे प्रश्नो के उत्तर लिखवाने के लिए एक मौखिक संविदा के अन्तर्गत एक अवैध व्यवस्था तैयार करते-कराते आ रहे हैं, जिसका परिणाम होता है कि अधम कोटि के विद्यार्थी उच्चकोटि का अंक अर्जित कर गर्व से सीना फुलाये देखे जाते हैं। हमने यह भी देखा है कि जो मेधावी विद्यार्थी उच्चकोटि के अंक अर्जित करने से वंचित रखे जाते हैं, वे अपना परीक्षाफल देखकर इतने विक्षुब्ध हो जाते हैं कि ‘अवसाद’ (हतोत्साह) दशा प्राप्त कर जाते हैं तथा उन्हीं मे से कुछ ऐसे दुस्साहसिक भी होते हैं, जो स्वयं के साथ अन्याय किये जाने का भाव उत्पन्न हो जाने के कारण निराशा से ‘आत्मघात’ (आत्महत्या) तक कर लेते हैं।

विद्यार्थी यदि मनोयोगपूर्वक विद्यार्थी-जीवन-यापन कर रहा होता है तब वह भाँति-भाँति के स्वप्न और आकांक्षा (‘आकांक्षाओं’ अशुद्ध है।) को सहचर बनाकर अध्यवसाय कर रहा होता है, जो उसके मन-मस्तिष्क-प्राण के साथ सम्पृक्त (सम्बद्ध) रहते हैं। अब आप कल्पना करें, वैसी स्थिति मे यदि उस पर नकारात्मक परीक्षापरिणाम का ‘तुषारपात’ होता है तो वह किस रूप मे कहाँ तक दुष्प्रभावित होगा?

आप किसी ऐसे केन्द्र मे पहुँचें, जहाँ उत्तरपुस्तिकाओं का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाता है। आप देखेंगे कि अधिक रुपये की चाह मे अधिकतर उत्तरपुस्तिकाओं का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाता है― जिसकी जितनी उत्तरपुस्तिकाएँ, उतने ही अधिक उसके पारिश्रमिक। प्राय: उत्तरपुस्तिकाओं के वितरण मे भी सम्बन्धित व्यक्ति ‘गोलमाल’/’घालमेल’ करता पकड़ा जाता है और संवादहीनता के चलते, वैचारिक प्रदूषण जन्म लेने लगता है।

इसका प्रत्यक्ष परिणाम और प्रभाव है कि हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षाओं मे परीक्षकों की लापरवाही के चलते, हज़ारों विद्यार्थी दुष्प्रभावित होते आ रहे हैं। किसी के प्रश्नोत्तर का परीक्षण ही नहीं किया जाता, जिसके कारण वह विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हो जाता है। किसी के अनेक प्रश्नोत्तर देखे नहीं जाते और न ही अंक दिये जाते; किसी के उत्तरपुस्तिका मे दिये गये अंकों के योग किये नही जाते; किसी के ग़लत उत्तर को भी सही मानकर अंक दे दिये जाते हैं; किसी को प्रायोगिक परीक्षा मे अधिक अंक दे दिये जाते हैं और लिखित मे कम तथा दोनो अंकों के योग मे घोर विसंगतियाँ व्याप्त कर दी जाती हैं, जो विद्यार्थी के लिए भविष्यघातक सिद्ध होते हैं। किसी को प्रायोगिक परीक्षा मे जो अंक दिये जाते हैं, उसे लिखित परीक्षा मे जोड़े ही नहीं जाते। जाने कितने प्रकार की कुव्यवस्था उत्तरपुस्तिकाओं के परीक्षण और मूल्यांकन मे दिखती रहती हैं।

एक ही विद्यालय के १० विद्यार्थियों को ३० अंक के स्थान पर मात्र ३ अंक दिये गये?
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यह घटना अमेठी के ‘श्री शिवप्रताप इण्टर कॉलेज’ की है। वहाँ के प्रधानाचार्य नवल किशोर सिंह का आरोप है कि उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के कार्यालय की लापरवाही के कारण उनके विद्यालय के १० विद्यार्थियों को ३० अंकों के स्थान पर मात्र ३ अंक दिये गये हैं, जिससे उनका परीक्षाफल प्रभावित हुआ है।

कितना आश्चर्य होता है जब हम पाते हैं कि उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के अधिकारियों के घोर प्रमाद और शिथिलता के कारण श्री शिवप्रताप इण्टर कॉलेज की हाईस्कूल की छात्रा भावना वर्मा को सभी छ: विषयों की प्रायोगिक परीक्षा मे ३०-३० अंकों के आधार पर कुल १८० अंक प्राप्त हुए थे, जबकि अंकतालिका मे ३-३ अंक चढ़ाकर कुल मात्र १८ अंक जोड़े गये हैं। इसप्रकार ९४ प्रतिशत अंक पानेवाली उस छात्रा को अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया गया है। इस आधार पर भावना को कुल ४०२ अंक ( ६७ प्रतिशत) दिये गये हैं, जबकि उसे कुल ५६४ अंक (९४ प्रतिशत) दिये जाने चाहिए थे। इतना ही नहीं, उसी विद्यालय के छ: अन्य विद्यार्थी सैद्धान्तिक (थीअरि/थ्योरी) परीक्षा मे उत्तीर्ण हैं, जबकि प्रायोगिक परीक्षा मे अनुत्तीर्ण हैं। वे विद्यार्थी हैं :– अनन्तदीप (९१ प्रतिशत), अर्चिता शुक्ल (६२.६० प्रतिशत), उवैस रज़ा (९४.६० प्रतिशत), भावना वर्मा ( सर्वेश कुमार (५२.६० प्रतिशत) तथा हर्ष कुमार (६० प्रतिशत)। अब, जब वे विद्यार्थी, उनके स्वजन तथा उनके विद्यालय के प्रधानाचार्य और अध्यापकवृन्द मुख्यमन्त्री से न्याय करने की माँग कर रहे हैं तब माध्यमिक शिक्षा-निदेशक महेन्द्र देव की प्रतिक्रिया मिलती है, “टाइपिंग एरर की वजह से ऐसा हुआ होगा। इसका करेक्शन करवाकर छात्रा को दोबारा रिजल्ट मिलेगा।”

यहाँ तो सजग विद्यार्थी, उनके मातापिता तथा उनकेअध्यापक जागरूक हैं, इसलिए वे अपने साथ न्याय कराने के लिए तत्पर हो चुके हैं; परन्तु जो विद्यार्थी जागरूक नहीं हैं; नियम का बोध नहीं है, उनके साथ कैसा और कितना छलावा हुआ होगा?

ऐसे मे, कोई उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ योगी से मिलकर शिकायत करना चाहता है तो कोई उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् के सम्बद्ध अधिकारियों से मिलकर अपने साथ किये गये अन्याय की कहानी सुनाकर न्याय चाहता है। दूसरी ओर, परीक्षकवृन्द कीर्तिमान बनवाने मे अपनी भूमिका और योगदान का यशगान करते घूम रहे हैं― हमने अभूतपूर्व कीर्तिमान बना लिया है। प्रश्न है, विद्यार्थी उस कीर्तिमान का अचार डालेंगे?

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)