‘उत्तरप्रदेश अधीनस्थ चयन आयोग की प्रारम्भिक पात्रता-परीक्षा’ मे पचास से अधिक अशुद्ध शब्दप्रयोग और अन्य व्याकरणात्मक दोष दिखने का दावा
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प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले को ‘भेड़िया’, ‘बन्दरिया’, ‘नवसिखिए’ और ‘महत्त्व’ लिखने भी नहीँ आता!..?
अभी हाल मे व्यापक स्तर पर ‘उत्तरप्रदेश अधीनस्थ चयन आयोग की प्रारम्भिक पात्रता-परीक्षा’ के प्रश्नपत्र ‘VZ9’ के सामान्य हिन्दी/हिन्दीभाषा वाले भाग मे आठ से बाईस तक प्रश्न थे, जिनमे शब्द, विरामचिह्नादिक के प्रयोग को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि प्राश्निक (प्रश्नपत्र तैयार करनेवाला) को हिन्दी-भाषा और व्याकरण की बिलकुल समझ नहीँ है। अपने इस विचार का विस्तार करते हुए, देश के व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया कि प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले व्यक्ति ने हमारे परीक्षार्थियोँ के साथ क्रूर छल किया है।
हिन्दीभाषा का पहला ही प्रश्न अशुद्ध है। ‘पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए’ मे ‘पूछना’ है और ‘प्रश्न’ भी। इन दोनो का ही अर्थ ‘प्रश्नात्मक’ है, इसलिए ‘प्रश्नो के उत्तर दीजिए’ होगा। इस गद्यांश के प्रथम वाक्य मे ‘उल्टा’ के स्थान पर ‘उलटा’ होगा; ‘उलट-पुलट’ प्रयोग होता है, नकि ‘उल्ट-पुल्ट’। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है, “उलटि-पुलटि लंका सब जारी।” ‘कभी कभी’ के स्थान पर ‘कभी-कभी’ होगा; क्योँकि यहाँ दोनो एक साथ प्रयुक्त हुए हैँ। जैसे– बहुत-बहुत, कहीँ-कहीँ इत्यादिक। इस गद्यांश मे कहीँ ‘पर’ से के पहले अर्द्ध- विरामचिह्न है, कहीँ अल्प- विरामचिह्न तो कहीँ ख़ाली छोड़ दिया गया है। ‘बड़े चैन’ के स्थान पर ‘बहुत चैन’ होगा; क्योँकि ‘चैन’ का ‘आकार’ नहीँ होता, ‘मात्रा’ होती है। ‘मनोविकारों का प्रवाह’ का प्रयोग है। यहाँ दो प्रकार की अशुद्धि है :– पहली ‘वचन-सम्बन्धी’ और दूसरी ‘तथ्य सम्बन्धी’। विकार से ‘विकारोँ ‘ का प्रयोग अशुद्ध है। हम आकारोँ, प्रकारोँ, स्वीकारोँ इत्यादिक का प्रयोग नहीँ करते, फिर किसी प्रकार का विकार तरल पदार्थ नहीँ होता कि उसका प्रवाह हो। यहाँ अर्थ-भाव के अनुसार, मनोविकार’ का प्रसार, प्रभाव संक्रमण-जैसे शब्द प्रयुक्त होँगे।
‘भारी अपराध’ नहीँ होता; क्योँकि अपराध ‘हलका-भारी’ नहीँ होता; ‘दुर्दान्त अपराध’, ‘अमानवीय अपराध’ वा फिर ‘जघन्य कृत्य’ का प्रयोग होगा। प्रश्न ८ मे ‘शुद्ध मनोविकार’ मे प्रयुक्त विशेषण-शब्द ‘शुद्ध’ का प्रयोग अशुद्ध है; क्योँकि किसी प्रकार का विकार शुद्ध नहीँ होता। प्रश्न १० के चार उत्तर-विकल्प मे ‘दोनों’ का प्रयोग अशुद्ध है; क्योँकि दोनो के लिए प्रयुक्त शब्द स्वत: दिख रहे हैँ। हम ‘घड़ी और लेखनी दोनो’ का प्रयोग नहीँ कर सकते। प्रश्न १३ के गद्यांश मे ‘विचारा गया’ दिख रहा है; क्योँकि शुद्ध शब्द हैँ– ‘विचार किया गया’। ‘भाव’ शब्द स्वयं मे बहुवचन का शब्द है। हम ‘विभावोँ’, ‘अनुभावोँ’, ‘स्वभावोँ इत्यादिक का प्रयोग नहीँ करते। ‘नवसिखुए’ की जगह ‘नवसिखिये’ होगा। ‘संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता’ लज्जाजनक प्रयोग है। ‘संस्कृति की विशेषता’ को तोला (‘तौला’ अशुद्ध है।) जाता है क्या? यहाँ ‘संस्कृति की महती’ वा ‘प्रमुख विशेषता’ होगा। यहाँ ‘परन्तु’ से पहले पूर्ण विरामचिह्न लगाया गया है, जोकि अशुद्ध है; अर्द्ध-विरामचिह्न का व्यवहार होगा।
प्रश्न १४ के उत्तर-विकल्प मे ‘भेडिया’ और ‘बँदरिया’ अंकित है, जबकि वहाँ क्रमश: ‘भेड़िया’ और ‘बन्दरिया’ होगा। प्रश्न १८ मे ‘करायें’ के साथ ‘उन्हें’/’उन्हेँ ‘ होगा, ‘उसे’ नहीँ। प्रश्न २१ मे ‘महत्व’ के स्थान पर ‘महत्त्व’ (महत्+त्व=महत्त्व) होगा।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने ललकार (चुनौती) प्रस्तुत करते हुए, कहा है कि प्रश्नपत्र तैयार करानेवाली समिति के विरुद्ध कठोर काररवाई करने की ज़रूरत है। यह प्रश्नपत्र पूरी तरह से आपत्तिजनक है। सम्बन्धित प्रश्नो मे ‘विवरणचिह्न’ लापता हैँ; अल्प-अर्द्ध-विरामचिह्न, योजक चिह्नादिकोँ की पूरी तरह से अनदेखी की गयी है। ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ एक पूर्ण वाक्य है, इसलिए वाक्यान्त मे पूर्ण-विरामचिह्न का व्यवहार होगा।